विष्णु को पार्वती ने दिया था ये शाप, इसलिए वन में भटके श्रीराम
विष्णु को पार्वती ने दिया था ये शाप, इसलिए वन में भटके श्रीराम

दूसरों की जिंदगी से अगर कोई सबक सीखा जाए तो यह सबसे अच्छा तरीका है, क्योंकि इंसान की जिंदगी बहुत छोटी है। पढ़िए यह रोचक व प्रेरक कथा...
पौराणिक कथाएं जितनी रहस्यमय, रोचक और आसान हैं उनका संदेश भी उतना ही गहरा है। इनमें मनुष्य के लिए कई सबक छिपे होते हैं।
किसी दार्शनिक ने कहा है कि दूसरों की जिंदगी से अगर कोई सबक सीखा जाए तो यह सबसे अच्छा तरीका है, क्योंकि इंसान की जिंदगी बहुत छोटी है। ऐसी ही एक कथा भगवान शंकर और मां पार्वती की है। पढ़िए यह रोचक व प्रेरक कथा...
एक बार भगवान शंकर ने मां पार्वती से जुआ खेलने के लिए कहा। खेल शुरू हुआ और उसमें भगवान शिव अपना सर्वस्व हार गए। जुए में मिली पराजय के बाद वे गंगा तट की तरफ चल गए।
इधर कार्तिकेयजी शिव के पास आए तो उन्हें पूरी बात मालूम हुई। वे मां पार्वती के पास शिवजी की वस्तुएं लेने गए। अब पार्वतीजी को भी यह दुख हो रहा था कि उन्होंने जुए में शिव को हरा दिया और वे अपना सबकुछ हार गए।
उन्होंने भी पार्वतीजी के साथ जुआ खेला और शिवजी की वस्तुएं जीतकर वापस ले गए। थोड़ी देर बाद गणेशजी भी आ गए। पार्वती ने पूरी बात गणेशजी को बताई।
गणेशजी शिव के पास गए और उन्होंने जुआ खेला। इसमें गणेशजी विजयी हुए। वे घर आ गए और मां को इस बारे में बताया। पार्वतीजी ने कहा कि उन्हें शिवजी को साथ लाना चाहिए था। यह सुनकर गणेशजी पुनः शिव की तलाश में चले गए।
इस दौरान भगवान शिव भ्रमण करते हुए हरिद्वार आ गए। उनके साथ कार्तिकेय और भगवान विष्णु भी थे। गणेशजी ने शिव से घर चलने का निवेदन किया लेकिन शिव नहीं माने।
उस समय रावण भी वहां आया हुआ था। उसने बिल्ली का रूप धारण किया और गणेशजी के वाहन मूषक को डरा दिया। मूषक भयभीत होकर भाग गया।
भगवान विष्णु ने शिव का साथ देने के लिए एक पांसे का रूप धारण किया। इससे खेलने पर शिव की जीत निश्चित थी। पांसा हाथ में लेकर शिव ने गणेशजी से कहा, अगर पार्वती दोबारा जुआ खेले तो मैं चल सकता हूं।
गणेश ने दोबारा खेलने का भरोसा दिलाया। शिवजी घर पहुंच गए और पुनः खेल शुरू किया। शिव के पास खेल में रखने के लिए वस्तु नहीं थी, इसलिए नारद मुनि ने अपनी वीणा रख दी। इस बार हर दांव में शिवजी जीतने लगे।
परंतु उनकी विजय का यह सिलसिला ज्यादा देर तक नहीं चला क्योंकि गणेशजी को इसका शक हो गया था। उन्होंने मां पार्वती को पांसे की हकीकत बता दी। यह सुनकर पार्वती को क्रोध आया।
उन्होंने शिवजी को शाप दिया कि उन्हें गंगा का भार उठाना होगा। साथ ही नारद को शाप दिया कि वे कभी एक स्थान पर नहीं टिकेंगे, सदा घूमते रहेंगे और विष्णु को शाप दिया कि जो रावण हरिद्वार में आपका साथी था, वही एक दिन शत्रु बन जाएगा। मां ने कार्तिकेयजी को सदा बालक रूप में रहने का शाप दिया।
कथा का संदेश
इस कथा में हर मनुष्य के लिए गहरा संदेश छिपा है। इसका प्रमुख संदेश है- जुआ अनेक समस्याएं लेकर आता है। हर घर और जीवन की कमाई तक चली जाती है। इससे हमेशा दूर रहना चाहिए।
जुए में जीतने के लिए इंसान को छल करना पड़ सकता है, झूठ भी बोलने होते हैं। जुए में हारने के बाद पुनः विजय की इच्छा होती है जो इंसान से कई गुनाह करवा सकती है।
हो सकता है कि वह दोबारा हार जाए। अंततः जुआ अशुभ फल ही देता है। अतः शिव-पार्वती की इस कथा को पढ़कर हर मनुष्य को संकल्प लेना चाहिए कि वह हमेशा जुए से दूर रहेगा।
किसी दार्शनिक ने कहा है कि दूसरों की जिंदगी से अगर कोई सबक सीखा जाए तो यह सबसे अच्छा तरीका है, क्योंकि इंसान की जिंदगी बहुत छोटी है। ऐसी ही एक कथा भगवान शंकर और मां पार्वती की है। पढ़िए यह रोचक व प्रेरक कथा...
एक बार भगवान शंकर ने मां पार्वती से जुआ खेलने के लिए कहा। खेल शुरू हुआ और उसमें भगवान शिव अपना सर्वस्व हार गए। जुए में मिली पराजय के बाद वे गंगा तट की तरफ चल गए।
इधर कार्तिकेयजी शिव के पास आए तो उन्हें पूरी बात मालूम हुई। वे मां पार्वती के पास शिवजी की वस्तुएं लेने गए। अब पार्वतीजी को भी यह दुख हो रहा था कि उन्होंने जुए में शिव को हरा दिया और वे अपना सबकुछ हार गए।
उन्होंने भी पार्वतीजी के साथ जुआ खेला और शिवजी की वस्तुएं जीतकर वापस ले गए। थोड़ी देर बाद गणेशजी भी आ गए। पार्वती ने पूरी बात गणेशजी को बताई।
गणेशजी शिव के पास गए और उन्होंने जुआ खेला। इसमें गणेशजी विजयी हुए। वे घर आ गए और मां को इस बारे में बताया। पार्वतीजी ने कहा कि उन्हें शिवजी को साथ लाना चाहिए था। यह सुनकर गणेशजी पुनः शिव की तलाश में चले गए।
इस दौरान भगवान शिव भ्रमण करते हुए हरिद्वार आ गए। उनके साथ कार्तिकेय और भगवान विष्णु भी थे। गणेशजी ने शिव से घर चलने का निवेदन किया लेकिन शिव नहीं माने।
उस समय रावण भी वहां आया हुआ था। उसने बिल्ली का रूप धारण किया और गणेशजी के वाहन मूषक को डरा दिया। मूषक भयभीत होकर भाग गया।
भगवान विष्णु ने शिव का साथ देने के लिए एक पांसे का रूप धारण किया। इससे खेलने पर शिव की जीत निश्चित थी। पांसा हाथ में लेकर शिव ने गणेशजी से कहा, अगर पार्वती दोबारा जुआ खेले तो मैं चल सकता हूं।
गणेश ने दोबारा खेलने का भरोसा दिलाया। शिवजी घर पहुंच गए और पुनः खेल शुरू किया। शिव के पास खेल में रखने के लिए वस्तु नहीं थी, इसलिए नारद मुनि ने अपनी वीणा रख दी। इस बार हर दांव में शिवजी जीतने लगे।
परंतु उनकी विजय का यह सिलसिला ज्यादा देर तक नहीं चला क्योंकि गणेशजी को इसका शक हो गया था। उन्होंने मां पार्वती को पांसे की हकीकत बता दी। यह सुनकर पार्वती को क्रोध आया।
उन्होंने शिवजी को शाप दिया कि उन्हें गंगा का भार उठाना होगा। साथ ही नारद को शाप दिया कि वे कभी एक स्थान पर नहीं टिकेंगे, सदा घूमते रहेंगे और विष्णु को शाप दिया कि जो रावण हरिद्वार में आपका साथी था, वही एक दिन शत्रु बन जाएगा। मां ने कार्तिकेयजी को सदा बालक रूप में रहने का शाप दिया।
कथा का संदेश
इस कथा में हर मनुष्य के लिए गहरा संदेश छिपा है। इसका प्रमुख संदेश है- जुआ अनेक समस्याएं लेकर आता है। हर घर और जीवन की कमाई तक चली जाती है। इससे हमेशा दूर रहना चाहिए।
जुए में जीतने के लिए इंसान को छल करना पड़ सकता है, झूठ भी बोलने होते हैं। जुए में हारने के बाद पुनः विजय की इच्छा होती है जो इंसान से कई गुनाह करवा सकती है।
हो सकता है कि वह दोबारा हार जाए। अंततः जुआ अशुभ फल ही देता है। अतः शिव-पार्वती की इस कथा को पढ़कर हर मनुष्य को संकल्प लेना चाहिए कि वह हमेशा जुए से दूर रहेगा।
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