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सम्भोग (सैक्स, शारीरिक संबंध )


सम्भोग दिखाता चित्र

सम्भोग (अंग्रेजीSexual intercourse) या सेक्सुअल इन्टरकोर्स) मैथुन या सेक्स की उस क्रिया को कहते हैं जिसमे नर का लिंग मादा की योनि में प्रवेश करता हैं। सम्भोग अलग अलग जीवित प्रजातियों के हिसाब से अलग अलग प्रकार से हो सकता हैं। सम्भोग को योनि मैथुन, काम-क्रीड़ा, रति-क्रीड़ा भी कहते हैं।

सृष्टि में आदि काल से सम्भोग का मुख्य काम वंश को आगे चलाना व बच्चे पैदा करना है। जहाँ कई जानवर व पक्षी सिर्फ अपने बच्चे पैदा करने के लिए उपयुक्त मौसम में ही सम्भोग करते हैं वहीं इंसानों में सम्भोग इस वजह के बिना भी हो सकता हैं। सम्भोग इंसानों में सुख प्राप्ति या प्यार या जज्बात दिखाने का भी एक रूप हैं। सम्भोग अथवा मैथुन से पूर्व की क्रिया, जिसे अंग्रेजी में फ़ोर प्ले कहते हैं, के दौरान हर प्राणी के शरीर से कुछ विशेष प्रकार की गन्ध (फ़ीरोमंस) उत्सर्जित होती है जो विषमलिंगी को मैथुन के लिये अभिप्रेरित व उत्तेजित करती है।

कुछ प्राणियों में यह मौसम के अनुसार भी पाया जाता है। वस्तुत: फ़ोर प्ले से लेकर चरमोत्कर्ष की प्राप्ति तक की सम्पूर्ण प्रक्रिया ही सम्भोग कहलाती है बशर्ते कि लिंग व्यवहार का यह कार्य विषमलिंगियों के बीच हो रहा हो।

कई ऐसे प्रकार के सम्भोग भी हैं जिसमें लिंग का उपयोग नर और मादा के बीच नहीं होता जैसे मुख मैथुन अथवा गुदा मैथुन उन्हें मैथुन तो कहा जा सकता है परन्तु सम्भोग कदापि नहीं।

उपरोक्त प्रकार के मैथुन अस्वाभाविक अथवा अप्राकृतिक व्यवहार के अन्तर्गत आते हैं या फिर सम्भोग के साधनों के अभाव में उन्हें केवल मनुष्य की स्वाभाविक आत्मतुष्टि का उपाय ही कहा जा सकता है, सम्भोग नहीं।

इन्हें भी देखें



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फूल, पौधों का जनन अंग

प्रजनन की वह क्रिया जिसमें दो युग्मकों के मिलने से बनी रचना युग्मज (जाइगोट) द्वारा नये जीव की उत्पत्ति होती है, लैंगिक जनन (sexual reproduction) कहलाती है।[1]यदि युग्मक समान आकृति वाले होते हैं तो उसे समयुग्मक कहते हैं। समयुग्मकों के संयोग को संयुग्मन कहते हैं। युग्मनज या तो सीधे पौधे को जन्म देता है या विरामी युग्मनज बन जाता है जिसे जाइगोस्पोर कहते हैं। इस प्रकार के लैंगिक जनन को 'समयुग्मी' कहते हैं।

लैंगिक जनन की प्रक्रिया के दो मुख्य चरण हैं - अर्धसूत्री विभाजन तथा निषेचन (fertilization)।

लैंगिक जनन की उत्पत्ति कैसे हुई, यह एक पहेली है। इस विषय में कई व्याख्याएँ प्रस्तुत की गईं हैं कि अलैंगिक जननसे लैंगिक जनन क्यों विकसित हुआ।

यौन प्रजनन का विकाससंपादित करें

कई protists यौन पुनरुत्पादन, बहुकोशिकीय पौधों, जानवरों, और कवक के रूप में करते हैं। यूकेरियोटिक जीवाश्म रिकॉर्ड में, यौन प्रजनन पहली बार 1.2 अरब साल पहले प्रोटेरोज़ोइक ईऑन में दिखाई दिया था। सभी यौन पुनरुत्पादन यूकेरियोटिक जीव संभवतः एक एकल सेल वाले आम पूर्वज से निकलते हैं। यह संभव है कि सेक्स का विकास पहले यूकेरियोटिक सेल के विकास का एक अभिन्न हिस्सा था। ऐसी कुछ प्रजातियां हैं जो दूसरी बार इस फीचर को खो चुकी हैं, जैसे कि बडेलोइडिया और कुछ पार्टनोकैर्पिक पौधों।

वनस्पतियों में लैंगिक जननसंपादित करें

अधिक विकसित पौधों में फल और बीज द्वारा लैंगिक जनन होता है। उनके फूलों में नर गैमीट और मादा युग्मक (गैमीट / Gamete) होते हैं, जिनके सायुज्य से युग्मज (Zygote) बनते हैं। ये बीज के अंदर भ्रूण में विकसित हो, अंकुर बनकर नए पौधों को जन्म देते हैं।

गैमीट बहुत सूक्ष्म और एककोशिकीय होते हैं। लैंगिक जनन में दो विभिन्न जनकों की आवश्यकता होती है। कभी-कभी एक ही प्रकार के दो गैमीट मिलकर जनन करते हैं। ऐसे मिलन का समागम (Conjugation) कहते हैं। दो विभिन्न गैमीटों के मिलने को निषेचन (Fertilization) कहते हैं। शैवाल और कवक सदृश निम्न श्रेणी के पौधों में समागम से जनन होता है और उच्च श्रेणी की वनस्पतियों में निषेचन से। जिन पौधों के गैमीट में नर और मादा का विभेद नहीं होता उन्हें समयुग्मक (Isogametes) कहते हैं और ऐसे पौधों को समयुग्मी (isogamous)। निषेचन में नर और मादा के मिलने से जो बनाता है उसे शुक्रितांड (Oospore), गैमीट को असम युग्मक (heterogamete) और पौधे को असमयुग्मीया या विविधपुष्पी (heterogamous) कहते हैं।

जनन की उपर्युक्त विधियों के अतिरिक्त कुछ अन्य विधियों, जैसे अजीवाणुजनन (Apospory), अपयुग्मजनन (Apogamy) और असेचन जनन (Parthenogenesis) से भी जनन होता है।

जन्तुओं में लैंगिक जननसंपादित करें

प्राणियों में लैंगिक जनन की कई विधियाँ हैं, जिनमें प्रमुख विधियाँ हैं-

  • (1) सामान्य लैंगिक जनन,
  • (2) उभयलिंगी (Hermaphroditic) जनन,
  • (3) असेचन जनन (Parthenogenesis) और
  • (4) डिंभजनन (Paedogenesis)

सामान्य लैंगिक जननसंपादित करें

सामान्य लैंगिक जनन में दो जन्यु कोशिकाएँ मिलकर एक युग्मज बनाती हैं। दो जन्तुओं की उत्पत्ति दो विभिन्न लिंगों के जनकों में होती है। नर जन्यु को शुक्राणु (Sperm) और स्त्री जन्यु को डिंब या अंडाणु (Ovum) कहते हैं। ये जन्यु विशेष अवयवों अर्थात्‌ जनदों (Gonads) में उत्पन्न होते हैं। नर जनद को वृषण (Testes) और स्त्री जनद को अंडाशय (Ovary) कहते हैं। पूर्वोक्त दोनों जन्युओं के मिलन को संसेचन (Fertilization) कहते हैं। संसेचन के फलस्वरूप युग्मज का निर्माण होता है। युग्मजों के खंडीकरण से भ्रूण बनता है और विकसित होकर शिशु रूप में जन्म लेता है।

वृषण शुक्रजनन नलिकाओं से बना होता है। प्रत्येक नलिका की अंत:भित्ति भ्रूणीय एपिथीलियम (Germinal epithelium) की बनी होती है, जिसके गुणन और विभेदीकरण (differentiation) से शुक्राणु बनते हैं। यह प्रक्रिया तीन क्रमों में होती है। पहला क्रम गुणन अवस्था (phase of multiplication), दूसरा क्रम वृद्धि अवस्था (phase of growth) और तीसरा क्रम परिपक्व अवस्था (phase of maturation) का है। भ्रूणीय एपिथीलियम की सभी कोशिकाएँ निर्माण में सक्षम होती हैं, पर कुछ ही उसमें भाग लेती हैं। ये कोशिकाएँ सूत्रविभाजन द्वारा ज्यामितीय अनुपात में विभाजित होती हैं। विभाजन से बनी कोशिकाओं को शुक्राणु-कोशिक-जन (Spermatogonia) कहते हैं। शुक्राणु-कोशिका-जन बड़े सूक्ष्म होते हैं। इनके अंदर पोषक पदार्थ एकत्रित हेने से ये बढ़ने लगते हैं। ऐसी वर्घित कोशिकाओं को प्राथमिक शुक्राणु कोशिका (Primary spermatocytes) कहते हैं। ये फिर परिपक्व अवस्था में प्रवेश करती हैं। यहाँ प्राथमिक शुक्राणु कोशिकाओं का दो बार विभाजन होता है। प्रथम विभाजन अर्धसूत्रण (Meiosis) या ह्रास विभाजन (Reduction division) का है। इस विभाजन के पूर्व प्राथमिक शुक्राणु कोशिक के केंद्रक में उपस्थित क्रोमोसोम(Chromosome) की संख्या द्विगुणित (diploid) होती है, पर अर्धसूत्रण के समय पैतृक क्रोमोसोम अंतर्ग्रंथन (Synapsis) द्वारा जोड़ों में व्यवस्थित हे जो हैं। अंतर्ग्रंथन में कोई दो क्रोमोसोमी जोड़े नहीं बनाते वरन्‌ ऐसे ही क्रोमोसोम जोड़े बनाते हैं जो समधर्मी या समन शक्ति और रचना के होते हैं। इस प्रकार अर्धसूत्रण में पैतृक क्रोमोसोमों की संख्या अगुणित (haploid) हो जाती है। कोशिकाएँ अब द्वितीय शुक्राणुकोशिका हो जाती हैं। द्वितीय शुक्राणुकोशिका का एक बार फिर विभाजन होता है जिसे समसूत्रण (Mitosis) कहते हैं। इससे पूर्वशुक्राणु (Spermatids) बनते हैं, जो धीरे धीरे रूपांतरित होकर शुक्राणु बन जाते हैं।

लाक्षणिक शुक्राणु के तीन भाग - (1) सिर, (2) मध्य खंड या ग्रीवा और (3) पूँछ - होते हैं। विभिन्न शुक्राणुओं के सिर विभिन्न आकार के होते हैं। अधिकांश के अंडाकार, पर किस के छड़नुमा, किसी के कागपेंच से टेढ़े या अन्य प्रकार के भी होते हैं। इनके अग्रिम सिरे पर नुकीला अग्रस्थ भाग या एक्रोसोम (Acrosome) होता है। मध्य खंड प्राय: छोटा और बेलनाकार होता है। पूँछ का अक्षसूत्र (Axial filament) इसी में लिपटा रहता है। पूँछ तंतु के रूप में लंबी और क्रमश: पतली होती जाती है और कशाभ (Flagellum) की भाँति गतिशील होती है। यह शीघ्रतापूर्वक हिलती-डुलती रहती है, जिससे वीर्यद्रव, या जल में तैरकर अंडाणु में प्रवेश करने के लिये शुक्राणु आगे बढ़ता है।

अंडजनन (Oogenesis)संपादित करें

अंडाशय की कोशिकाओं से अंडे (Ova) उत्पन्न होते हैं। अंडे की भी (1) गुणन अवस्था, (2) वृद्धि अवस्था और (3) परिपक्व अवस्था होती है। अंडाशय की कुछ उत्पादक कोशिकाओं के गुणन विभाजन से डिंब कोशिकाजन (Oogonia) बनते हैं। कोशिकाजनों में अंडपीत एकत्र होकर बढ़ते हैं और बढ़कर प्राथमिक डिंबकोशिका (Ocoytes) बनते हैं। इनका फिर से ्ह्रास विभाजन होता है और ये दो अलग अलग कोशिकाओं में बँट जाते हैं। इनमें एक बहुत छोटी और दूसरी बड़ी होती है। छोटी को प्रथम ध्रुवीय पिंड (First polar body) ओर बड़ी को द्वितीय डिंबकोशिका कहते हैं। द्वितीय डिंबकोशिका का सूत्रण विभाजन होती है। यहाँ भी एक छोटी और दूसरी बड़ी होती है। बड़ी को परिपक्व या प्रौढ़ अंडा और छोटी को द्वितीय ध्रुवीय पिंड कहते हैं। प्राथमिक ध्रुवीय पिंडों का भी सूत्रण होकर ध्रुवकोशिका (Polocytes) प्राप्त होती हैं। ध्रुवीय रचनाएँ जनन के काम के लिए बेकार होती हैं।

अर्धभ्रूण या ह्रास विभाजन इस कारण आवश्यक है कि इस प्रकार उत्पन्न जन्युओं के संयोग से जो युग्मज बने उनमें पैतृक सूत्रों की संख्या उतनी ही रहे जितनी उस जाति के लिए आवश्यक है, अन्यथा संतान में पैतृक गुणों के बदल जाने की संभावना हो सकती है। पैतृक सूत्रों की संख्या निश्चित रखने के लिए युग्मज जगक के समय उनका ह्रास विभाजन आवश्यक है।

निषेचन (Fertilization)संपादित करें

डिंब के शुक्राणु से मिलने पर ही नए जीव की उत्पत्ति होती है। जिन प्राणियों में लैंगिक जनन होता है, उनमें डिंब और शुक्राणु (स्पर्म) दो विभिन्न लिंगवाले प्राणियों में उत्पन्न होते हैं। इनका सायुज्य नर और मादा के मिलकर संभोग करने से होता है। सम्भोग के समय डिंब और शुक्राणु निकट तो आ जाते हैं, पर शुक्र का डिंब के साथ मिलकर एक हो जाना, अर्थात्‌ डिंब का निषेचन कई बातों पर निर्भर करता है।[2]परिस्थितियों के अनुकूल न होने पर अंडे का संसेचन नहीं होता। संसेचन के लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ आवश्यक हैं :

  • 1. शुक्राणु का गतिशील होना - वृषण में शुक्राणुगतिशील नहीं होता, क्योंकि वृषण में थोड़े ही स्थान में असंख्य शुक्राणु रहते हैं। उनसे उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा इतनी अधिक होती है कि वे शिथिल रहते हैं, किंतु मैथुन के समय वृषण से निकलकर शुक्रप्रणाली में प्रवेश करने पर वे क्रियाशील एवं गतिशील हो जाते हैं। डिंब तक पहुँचने के लिय शुक्राणु को कुछ दूरी तय करनी पड़ती है और वह दूरी शुक्राणु वीर्य में (जहाँ अंत:संसेचन होता है), या जल में (जहाँ बाह्य संसेचन होता है), तैरकर तय करते हैं, अत: शुक्राणु का गतिशील होना आवश्यक है।
  • 2. डिंब और शुक्राणु का परिपक्व होना - संसेचन के लिए डिंब और शुक्राणु का परिपक्व होना भी आवश्यक है। किसी किसी प्राणी में डिंब अपरिपक्व अवस्था में स्खलित होता है और ध्रुवीय पिंड (polar bodies) अलग नहीं हुए रहते हैं। ऐसे डिंब के अंदर शुक्र का प्रवेश होने पर प्रथम और द्वितीय ध्रुवीय पिंड अलग हो जाने पर ही संसेचन की विधि पूर्ण होती है। जन्यु जब तक परिपक्व नहीं होते तब तक संसेचन संभव नहीं होता।
  • 3. किसी द्रव माध्यम का होना - जिन प्राणियों में डिंब और शुक्राणु का संयोग जननी के शरीर के अंदर अथवा अंत: संसेचन द्वारा होता है, उन प्राणियों में नर की कुछ विशेष ग्रंथियों में से एक प्रकार के द्रव का स्त्राव होता है, जिसे वीर्य (semen) कहते हैं।[3] इसी द्रव के साथ शुक्राणु मिले रहते हें। वीर्य के माध्यम से शुक्राणु तैरकर, गह्वर द्वार से होकर, डिंबवाही नली (Fallopian tubes) में प्रवेश कर डिंब से संयोग करते हैं। जिन प्राणियों में डिंब ओर शुक्राणुओं का संयोग प्राणी के शर के बाहर होता है, अर्थात्‌ जहाँ बाह्य संसेचन होता है, जैसे मछली और मेढक में, तो ऐसा संसेचन जल में होता है।
  • 4. डिंब और शुक्राणु का एक ही जाति के प्राणी का होना - साधारणतया ऐसा देखा जाता है कि कुत्ते कुतियों से, सांड़ गाय से, मुर्गा मुर्गी से तथा बकरा बकरी से ही संयोग करता है। यदि विभिन्नजातियों के पशुओं का संयोग कराया भी जाए, तो उससे गर्भधारण नहीं होता, क्योंकि एक जाति का शुक्राणु दूसरी जाति के डिंब से संसेचन नहीं कर सकता। यदि किसी प्रकार ऐसा संसेचन कराया भी जाए और उससे संतान भी उत्पन्न हो तो संतान में जनन की क्षमता नहीं रहती। वह नपुंसक होती है।

अंत: संसेचन करनेवाले प्राणियों में अंडों की संख्या बहुत कम होती है और एक बार में एक या कुछ ही संतान उत्पन्न होती है, पर जिन प्राणियों में बाह्य संसेचन होता है, डिंब की संख्या अत्यधिक होती है और अंडों की अपेक्षा शुक्राणुओं की संख्या तो और भी अधिक। जब अंडों और शुक्राणुओं का संयोग जल में होता है, युग्मजों के लिए अनेक बाधाएँ रहती हैं, जैसे जल का ताप, उसकी अम्लता या क्षारीयता, (जल का पीएच मान आदि); जल की धारा की गति (मंद या तीव्र), आसपास के अन्य जलीय प्राणियों की उपस्थिति इत्यादि। अत: स्पीशीज की श्रृंखला बनाए रखने के लिए प्रकृति डिंब और शुक्राणुओं का उत्पादन अधिक संख्या में करती है, क्योंकि इन बहुसंख्यक अंडों ओर शुक्राणुओं में से अनेक अंडे और शुक्राणु उपर्युक्त कारणों में से कोई भी प्रतिकूल कारण हेने पर असंसेचित अवस्था में मर जाते हैं। संसेचन के लिए एक डिंब को एक ही शुक्राणु की आवश्यकता होती है। मनुष्य के एक बार के मैथुन में स्खलित वीर्य में सामान्यत: शुक्राणुओं की संख्या 22,60,00,000 अनुमानित की गई है। इनमें केवल एक ही शुक्राणु डिंब को संसेचित करने का काम करता है। प्रत्येक डिंबोत्सर्ग (Ovilation) में केवल एक ही डिंब डिंबग्रंथि से निकलता है।

ज्यों ही कोई क्रियाशील शुक्राणु अपने ही स्पीशीज के प्राणी के डिंब के संपर्क में आता है त्यों ही वह उसमें प्रवेश कर जाता है। शुक्राणु का सिर तो डिंब के अंदर घुस जाता है, किंतु उसकी पूँछ टूटकर बाहर ही रह जाती है। डिंब में शुक्र प्रवेश कर उसके अंदर अनेक घटनाओं को उत्तेजित करता है। सबसे पहले वह डिंब में किसी अन्य शुक्राणु के प्रवेश को रोकता है। यह काम इस प्रकार होता है :

संसेचित अंडे के बाह्य स्तर से एक प्रकार का रासायनिक स्राव निकलता है, जो अन्य शुक्राणु को डिंब की ओर आकर्षित न कर विकर्षित करता है अथवा डिंब के बाहर चारों ओर एक प्रकार की जेली जैसी झिल्ली (Fertilization Membrane) बन जाती है, जिससे शुक्राणु का प्रवेश नहीं हो पाता अथवा अभेद्य भित्ति से घिरा डिंब का बिल्कुल छोटा छेद, माइक्रोपाइल (Micropyle) एक शुक्राणु के प्रवेश करते ही बंद हो जाता है।

डिंब में प्रविष्ट करने पर शुक्राणु निर्धारित पथ से केंद्रक की ओर अग्रसर होते हुए डिंब के पूर्वकेंद्रक (Pronucleus) से मिलता है और शुक्राणु तथा डिंब दोनों ही के पूर्वकेंद्रक घुलमिलकर क्रोमोसोम बनाते हैं, जो कोशिका द्रव्य में स्वतंत्र पड़े रहते हैं। डिंब अब युग्मज बन जाता है। डिंब का सेंट्रोसोनोम लुप्त हो जाता है, पर शुक्राणु का सेंट्रोसोम दो भागों में बँट जाता है और एक गतिशील तर्कु (spindle) का निर्माण करता है। इस तर्कु के अयनवृत्त के चारों ओर क्रोमोसामेम अपनी अपनी जगह ले लेते हैं और संसेचित डिंबकोश का विभाजन और विकास शुरू होकर भ्रूण का निर्माण होने लगता है।

जन्युओं का सायुज्य कैसे होता है, इसपर विचार करने से पता लगता है कि अधिकांश दशाओं में तो संयोग से ही नर जन्यु तैरते-तैरते मादा जन्यु के संपर्क में आ जाता है, पर कुछ दशाओं में शुक्राणु सीधे निर्दिष्ट लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। इसका कारण शुक्राणु का किसी विशेष रासायनिक द्रव्य की ओर आकर्षित होना है। इस रासायनिक द्रव्य को डिंब उत्पन्न करता है। इसे रासायनिक कर्षण (Chemo taxis) कहते हैं। पर हर दशा में रासायनिक कर्षण नहीं होता। ऐसा समझा जाता है कि नर जन्यु और मादा जन्यु में ध्रुवीय अंतर होता है, जिससे वे परस्पर आकर्षित होते हैं। आकर्षण का वास्तविक कारण क्या है, यह निश्चित रूप से अभी नहीं कहा जा सकता।

मैथुनसंपादित करें

संभोग के समय मादा प्राय: निष्क्रिय रहती है और नर में मादा के आलिंगन के लिए विविध भाँति के आलिंगन अवयव विकसित होते हैं। कुछ प्राणियों में गौण लैक्षणिक लक्षण, जैसे मानव नर में दाढ़ी, मूछें और नारी में इनका अभाव किंतु विकसित स्तन का होना और चिड़ियों में विविध भाँति के रंगों से युक्त पर इत्यादि, पाए जाते हैं। यह गौण लक्षण ज्ञानेंद्रियों को प्रभावित कर नर तथा मादा का संयोग कराने में सहायक होते हैं। कुछ प्राणियों में कुछ ऐसे भी सहायक अवयव पाए जाते हैं, जो संतान की रक्षा के लिए होते हैं। अनेक प्राणियों में संसेचन के पश्चात्‌ माँ-बाप की जिम्मेदारियाँ समाप्त हो जाती हैं और युग्मज बिना किसी देखरेख के विकसित होते हैं, कुछ प्राणियों में बच्चे अपना लालन पालन स्वयं करते हैं, पर कुछ प्राणियों में माँ बाप अपनी संतान की रक्षा का बड़ा ध्यान रखते हैं। वे अंडे या भ्रूण की रक्षा के लिए कोई उपयुक्त स्थान चुनते हैं। कुछ उनको बाँध रखने का उपाय भी करते हैं। इसके लिए वे कोए (Cocoon) का निर्माण करते हैं। अन्य जंतुओं में अंडनिक्षेपक (Ovipositor) होते हैं, जिनमें वे अंडे सुरक्षित रखते हैं अथवा किसी जीवित या मृत प्राणी के ऊतक से वे यही काम लेते हैं। वहीं अंडे का विकास होता और डिंभ (Larva) बनते हैं।

कुछ प्राणियों के अंडे या डिंभ माँ या बाप से चिपके रहते हैं। कुछ माँ बाप उन्हें गलफड़ों (gills) में लिए फिरते हैं, कुछ शिशुथैलियों (Brood pouches) में, जैसे क्रस्टेशिया (crustacea) में, कुछ स्वरथैलियों में (जैसे मेढक में), कुछ फैली हुई डिंबवाहिनियों में और कुछ मारसुपियल थैलियों (Marsupial pouches) में लिए फिरते हैं।

भ्रूण विकास (Embryology)संपादित करें

कुछ प्राणियों में डिंब और शुक्राणु का संयोग माता के शरीर के अंदर ही होता है और युग्मज का खंडीकरण एवं भ्रूण का विकास भी वहीं होता है। भ्रूण के पूर्ण विकसित हो जाने पर शिशु माता के गर्भ से प्रसव द्वारा बाहर चला आता है। जितने दिनों तक भ्रूण माता के गर्भ में रहता है, उतने समय को गर्भकाल (Gestation period) कहते हैं। इस प्रकार के विकास को अंत: विकास (Internal development) कहते हैं। कुछ मछलियों, छिपकलियों और पक्षियों में डिंब का संसेचन मैथुन द्वारा मादा के शरीर के अंदर ही होता है और युग्मज अथव संसेचित डिंब चूर्णमय (Calcareous) आवरण से मंडित होकर शरीर के बाहर निकलता है। भ्रूण का विकास बाहर ही होता है। पूर्ण विकसित हो जाने पर बच्चा अंडे की खोली (Egg case) को तोड़कर अंडे से बाहर चला आता है। इस प्रकार के विकास को बाह्य विकास (External development) कहते हैं। मछलियों, मेढ़कों तथा निम्न कोटि के अन्य प्राणियों में डिंब और शुक्राणु दोनों ही शरीर के बाहर स्खलित किए जाते हैं और वहीं उनका संयोग होता है तथा अंडे बाहर ही भ्रूण में विकसित होते हैं। इस प्रकार संसेचन भी और विकास भी बाह्य होता है (देखें भ्रूण विज्ञान)।

गाय, भैंस, बकरी, मनुष्य इत्यादि, जिनमें भ्रूण माता के शरीर के भीतर परिवर्धित होता है और शिशु जीवित अवस्था में बाहर निकलता है, जरायुज (viviparous) कहलाते हैं। इनके विपरीत मछली मेढक, साँप, छिपकली और चिड़िया जैसे जंतु, जिनमें शिशु अंडे से बाहर निकलते हैं, अंडज (oviparous) कहलाते हैं।

शिशु का पोषणसंपादित करें

अधिकांश दशाओं में भ्रूण का पोषण माँ के रक्त से, अपरा (placenta) सदृश किसी संयोजक द्वारा होता है। कुछ शार्क मछलियाँ, ऐनाब्लेब्स (Anablebs= एक प्रकार की मछली), कुछ छिपकलियों और स्तनियों में इसी प्रकार की व्यवस्था पाई जाती है। कुछ प्राणियों में जन्म के पश्चात्‌ अथवा अंडे से बाहर आने पर नवजात शिशु को माँ-बाप भोजन खिलाते हैं। स्तनियों में स्तन होता हे, जिससे दूध का स्राव होता है, यह दूध नवजात शिशु का आहार होता है। बहुतेरी चिड़ियों के मुख से लार का स्राव (salivary secretion) होता है, जो चूजों का भोजन होता है। अन्यथा चिड़ियाँ दाना चुगकर शिशु के मुख में डाल देती हैं।

जननकालसंपादित करें

सधारणतया वयस्क होनेपर जनन प्रारंभ होता है, पर कुछ प्राणियों में जैसे मिजेज (Midges) और ऐक्ज़ोलाटल (Axolotle) में शैशव अवस्था में ही जनन प्रारंभ हो जाता है। इसे असेचन जनन (Parthenogenesis) कहते हैं। अधिकांश प्राणियों या पौधों की जननऋतु, प्राय: निश्चित होती है, डिंब का विकास ऋतु और वातावरण पर निर्भर करता है। अनेक चिड़ियों, कीटों और अन्य प्राणियों में वसंत या ग्रीष्म ऋतु में जनन की क्रियाशीलता अधिक होती है। वातावरण की स्थिति, ताप, आर्द्रता, शुष्कता इत्यादि शरीरक्रिया को प्रभावित करती हैं और इनका प्रभाव जनन पर भी पड़ता है। भोजन के साथ ही जनन का गहरा संबंध है। जहाँ वातावरण एक सा रहता है, वहाँ के प्राणियों में ऋतुकाल (reproduction period) निश्चित नहीं होता, जैसे फिलीपाइन द्वीपों में जलवायु की परिस्थितियों से ही कुछ प्राणियों का प्रवसन (migration) होता है और सहायक जननेंद्रियों में सामयिक, बाह्य या अंत:परिवर्तन होते हैं। कुछ प्राणियों में जनन जीवनपर्यंत चलता है, पर कुछ में उम्र की वृद्धि के साथ-साथ जननक्रियाशीलता मंद पड़ जाती अथवा बिलकुल रुक जाती है। अधिकांश प्राणियों में जननक्रियाशीलता के बद विश्राम काल आता है और उसके बाद फिर ऋतुकाल आरंभ होता है। ऐसा क्रम श्रृंखला (rhythmical series) में या एकांतरणत: (alternation) होता है। उच्च कोटि के प्राणियों में, जिनमें मनुष्य भी आता है, गरम होना (Heat), रज:स्राव (menstruation) अथवा अंडाणु उत्पादन (ovilation) भी क्रमबद्ध होते हैं।

अंत:स्राव ग्रंथियाँसंपादित करें

प्राणियों के शरीर में कुछ ऐसी ग्रंथियाँ हैं, जिनकी कोई वाहनी (duct) नहीं है। इन ग्रंथियों से हारमोन बनते हैं, जो सीधे रक्त में चले जाते हैं। रक्तप्रवाह के साथ साथ ये समस्त शरीर में घूमते हैं और शरीर पर भिन्न-भिन्न प्रभाव उत्पन्न करते हैं। ये कुछ अंगों को उद्दीप्त करते और कुछ का दमन करते हैं। इनमें पीयूष ग्रंथि (pituitary gland) और जननग्रंथि (gonads) का प्रजनन से बड़ा घना संबंध है (देखें हारमोन)।

उभयलिंगी जनन (Hermaphrodition Reproduction)संपादित करें

कुछ प्राणियों में नर जननेंद्रिय और नारी जननेंद्रित दोनों होती हैं तथा शुक्राणु और अंडे एक ही प्राणी में उत्पन्न होते हैं। ये उभयलिंगी प्राणी हैं। इनमें या तो एक ही प्रकार के क्रोमोसोम अंदर ही परस्पर मिलकर जनन करते हैं, जिसे स्वयंसेसेचन कहते हैं, अथवा दो उभयलिंगी जोड़े खाकर परस्पर एक दूसरे के अंडे का संसेचन करते हैं, जिसे स्वयंसंसेचन कहते हैं, अथवा दो उभयलिंगी जोड़े खाकर परस्पर एक दूसरे के अंडे का संसेचन करते हैं, जिसे 'क्रौस' (cross) कहते हैं। केचुएँ, जोंकें, घोंघे और हाइड्रा पिछले प्रकार के उदाहरण हैं। स्वयंसंसेचन बिरला ही पाया जाता है।

असंसेचन जननसंपादित करें

इसमें अंडे और शुक्र के सायुज्य का होना आवश्यक नहीं होता। इसे अक्षतयौनिक जनन (virgin reproduction) भी कहते हैं। इसका उदाहरण मधुमक्खियाँ और ऐफिड्स हैं। मधुमक्खियाँ कुछ संसेचित और कुछ असंसेचित या अगर्भित अंडे देती हैं। संसेचित अंडे से श्रमिक और रानी मधुमक्खियाँ उत्पन्न होती हैं और असंसेचित अंडे से ड्रोन या नर मधुमक्खियाँ उत्पन्न होती हैं। कुछ सामुद्रिक प्राणियों, जैसे सी अर्चिन (sea urchin) में भी असंसेचित अंडे से नए प्राणी का उत्पादन वैज्ञानिकों ने संभव किया है। मेढक के अंडे को सूई से गोद कर तथा उसका विकास कर बैंगची (tadpoles) उत्पन्न किया गया है। इस प्रकार भौतिक और रासायनिक विधियों से भी अंडे को विकसित होने के लिय सफलतापूर्वक प्रेरित किया गया है।

डिंभजनन (Paedogenesis)संपादित करें

यकृत कृमि (Liver fluke) और टाइगर सैलामंडर (Tiger salamander) में जनन की एक अपूर्व रीति पाई जाती है, जिसे डिंभजनन कहते हैं। इसमें जब प्राणी डिंभावस्था (larval stage) में ही रहते हैं और पूर्ण वयस्क नहीं हुए रहते तभी जनन करने लगते हैं और संतानवृद्धि करते हैं।


इन्हें भी देखेंसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1.  यादव, नारायण, रामनन्दन, विजय (मार्च २००३). अभिनव जीवन विज्ञान. कोलकाता: निर्मल प्रकाशन. पृ॰ १-४०. |access-date= दिए जाने पर |url= भी दिया जाना चाहिए (मदद)
  2.  "स्पर्म के बारे में ये 9 बातें आपको शायद ही पता हों". मूल से 2 अक्तूबर 2017 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 अक्तूबर 2017.
  3.  "New Theory on How The Aggressive Egg Attracts Sperm". मूल से 15 अक्तूबर 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 अक्तूबर 2017.


नर

रोमन देवता मंगल (युद्ध के देवता) का प्रतीक अक्सर पुरुष सेक्स का प्रतिनिधित्व करने के लिए उपयोग किया जाता है। यह मंगल ग्रह के लिए भी खड़ा है और लोहे के लिए रासायनिक संकेत है ।

नर वो जीव जिसका लिंग है जो की छोटे मोबाइल गमेट्सपैदा करता हैं जिसे की स्पर्म या शुक्राणु भी कहते हैं। हर एक शुक्राणु एक मादा अंडे के साथ क्रिया कर एक गर्भ के रूप में विकास कर सकता हैं।

हर कोई प्रजाति इस पुरुष और स्त्री के पहचान से नहीं जानी जा सकती है। इंसानों और जानवरों में लिंग जहाँ लिंग (अंग) से बताया जा सकता हैं वही अन्य जीवो में यह कई अन्य बातों पर निर्भर करता हैं।



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मानव पुरुष और स्त्री का वाह्य दृष्य

जीवविज्ञान में लिंग (Sex, Gender) से तात्पर्य उन पहचानों या लक्षणों से जिनके द्वारा जीवजगत् में नर को मादा से पृथक् पहचाना जाता है। जंतुओं में असंख्य जंतु ऐसे होते हैं जिन्हें केवल बाह्य चिह्नों से ही नर, या मादा नहीं कहा जा सकता। नर तथा मादा का निर्णय दो प्रकार के चिह्नों, प्राथमिक (primary) और गौण (secondary) लैंगिक लक्षणों (sexual characters), द्वारा किया जाता है। वानस्पतिक जगत् में नर तथा मादा का भेद, विकसित प्राणियों की भाँति, पृथक्-पृथक् नहीं पाया जाता। जो की सत्य है।

शब्दार्थसंपादित करें

आज हिन्दी में लिंग यानि लिंग शब्द का अर्थ नर शिश्न से लगाया जाता है लेकिन मूल संस्कृत में इसका अर्थ चिह्नप्रतीक अथवा लक्षण (यानि पहचान) के अर्थ में है। कणादमुनि कृत वैशेषिक दर्शन ग्रंथ में यह शब्द कई बार आता है।

लिंग का विकाससंपादित करें

जनन का इतिहास देखा जाए तो ज्ञात होगा कि संसार के आदि जीवों की उत्पत्ति अलैंगिक (asexual) ढंग से हुई; जैसे प्रोटोज़ोआ (Protozoa) तथा प्रोटोफ़ाइटा (Protophyta) के अनेक रूपों में नर तथा मादा द्वारा मिलकर सृष्टि नहीं हुई। इन जीवों की उत्पत्ति शरीर विखंडन (fission), मुकुलन (budding) तथा बीजाणु निर्माण (spore formation) द्वारा हुई। विकास के दूसरे चरण में नर तथा मादा के अत्यंत सूक्ष्म लक्षण प्रकट होने लगे। प्रोटोज़ोआ श्रेणी के कुछ अन्य जीव संयुग्मन (conjugation) द्वारा संतानोत्पादन करने लगे। इसमें एक ही प्रकार के दो जीव आपस में मिलकर एकाकार होने पर फिर विभाजित होकर अनेक संख्या में उत्पन्न होने लगे, जैसे वॉल्वॉक्स (Volvox) के निवहों (colonies) में देखा जाता है। इसके पश्चात् लिंग विकास की तीसरी अवस्था आई, जिसमें एक ही प्राणी के अंदर नर तथा मादा दोनों जननांग विकसित हुए, जैसे, केंचुआ (earth-worm), जोंक(leech) आदि में। लिंग विकास की अंतिम अवस्था में नर तथा मादा जननांग सर्वथा पृथक् हो गए, जैसा कुत्तों, बंदरों, गाय, बकरियों तथा मनुष्यों आदि में देखा जाता है। प्राथमिक लैंगिक लक्षणों के अंतर्गत नर में वृषण (testes) तथा मादा में अंडाशय (ovaries) आते हैं। गौण लैंगिक लक्षणों में उन अंगों तथा लक्षणों की गणना की जाती है, जिनसे नर और मादा को उनकी आकारिकी (morphology) द्वारा ही पृथक् पहचान लिया जाता है, जैसे कुछ कशेरुकी (vertebrate) जंतुओं में मैथुनांगों (copulatory organs) को स्पष्टत: पृथक् देखा जा सकता है। नर प्राणी में शिश्न (penis) तथा मादा में भग (vulva) मैथुनांग होते हैं। कतिपय अन्य जीवों में गौण लैंगिक लक्षणों के अंतर्गत मूँछदाढ़ी, सुंदर तथा भड़कीले पंख, सिर की कलगी, सींगस्तन, प्रभुत्व जमाना, मधुर स्वर, मातृत्व की इच्छा, आक्रमण क्षमता आदि आते हैं। इसी प्रकार वनस्पति जगत में भी फूलों की सुगंध, रंग, भड़कीलापन, फलोत्पादन आदि लैंगिक लक्षण होते हैं।

लिंग का निर्धारणसंपादित करें

प्राणियों में लिंग का निर्धारण तीन प्रकार से होता है :

(1) निषेचन (fertilization) के पहले ही,

(2) निषेचन के समय तथा

(3) निषेचन के बाद।

किंतु, सामान्यतः लिंग का निर्धारण निषेचन के ही समय होना माना जाता है। नर के शुक्राणु (sperm) का मादा के अंडाशय से संयुक्त होना निषेचन कहा जाता है। वातावरण में निषेचित अंडे, या युग्मनज (fertilized egg or Zygote) की क्रमश: वृद्धि होती रहती है।

नर तथा मादा का निर्धारण कुछ जटिल प्रक्रियाओं द्वारा होता है। वैज्ञानिकों ने इस संबंध में कई सिद्धांत उपस्थित किए हैं। इन सिद्धांतों में निम्नलिखित दो सिद्धांत अपेक्षाकृत अधिक प्रसिद्ध हैं : (1) गुणसूत्र, या क्रोमोसोम सिद्धांत तथा (2) हॉर्मोन सिद्धांत।




क्रोमोसोम सिद्धांतसंपादित करें

आनुवंशिक विज्ञान (Genetics) के अनुसार प्राणियों के शरीर में जो कोशिकाएँ (cells) पाई जाती हैं, उनमें कुछ ऐसी रचनाएँ होती है जो विशेष प्रकार के रंजकों और अभिरंजकों (dyes and stains) को ग्रहण कर लेती हैं, इन रचनाओं को क्रोमोसोम कहा जाता है। आनुवंशिक विज्ञान में विशेषकर युग्मकों, या लिंग कोशिकाओं (gametes or sex-cells) में पाए जाने वाले क्रोमोसोमों पर ही विचार किया जाता हे। भिन्न-भिन्न प्राणियों की जनन कोशिकाओं में क्रोमोसोमों की संख्या इस प्रकार पाई गई हैं :

प्राणी का नाम --- क्रोमोसोमों की संख्या

साइकन (Sycon) स्पंज -- 26

हाइड्रा (Hydra) --- 30 - 32

लंब्रिकस (Lumbricus) वंश की जोंक --- 32

यूनियो (Unio) सीप --- 32

तारामीन (Starfish) --- 36

झींगा (Squilla) मछली --- 48

बिच्छी (Buthus) --- 24

एक मछली (Scyllium) --- 24

ब्यूफोटोड (Bufo toad) --- 24 - 26

कच्छपगण (Chelonia) --- 56

मगर (Crocodile) --- 32

भेड़ (Sheep) --- 60

घोड़ा (Horse) --- 60 - 66

बंदर (Monkey) --- 48

मानव (Humans) --- 46

नेट्रिक्स (Natrix) --- 40

कपोतवंश या कोलंबा (Columba) --- 66

मुर्गा (Fowl) --- 18 - 20

चमगादड़ (Bat) --- 24

लीपस (Lepus) वंश का खरगोश --- 28 - 36

कुत्ता (Dog) --- 50 - 78

लोमड़ी (Fox) --- 38

बिल्ली (Cat) --- 66

चौपाए (Cattle) --- 38 - 60

बकरा (Goat) --- 60

भैंसा (Buffalo) --- 48 - 56

सूअर (Pig) --- 38 - 40

चिंपैंजी (Chimpanzee) --- 48

ऊँट (Camel) --- 70

सन् 1901-2 में मैक्क्लंग (Macclung) नामक विद्वान् ने क्रोमोसोम का पता लगाया। उसी ने कुछ सिद्धांत भी बनाए, जो कालांतर में वैज्ञानिक अनुसंधानों द्वारा पुष्ट होते गए। इस सिद्धांत में यह माना जाता है कि प्रत्येक प्राणी के कुछ विशिष्ट क्रोमोसोमों की संख्या पर उसका लिंग निर्भर करता है। क्रोमोसोमों की रचना को यदि अधिक शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी, जैसे इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखा जाए तो उसमें भी कुछ बहुत ही सूक्ष्म रचनाएँ दिखाई पड़ेगी। इनको जीन (Genes) कहा जाता है और यह विश्वास किया जाता है कि ये ही जनक के आनुवंशिक (hereditary) गुणों को उनकी संतानों तक पहुँचाते हैं। जंतुओं और वनस्पतियों के क्रोमोसोमों तथा जीनों को लेकर बहुत अधिक अनुसंधान और प्रयोग हुए हैं।

यह पाया गया है कि प्रत्येक प्राणी की जनन कोशिकाओं में पाए जानेवाले क्रोमोसोमों में कुछ ऐसे होते हैं, जिन्हें अलिंगसूत्र (Autosomes) कहते हैं। ये नर तथा मादा दोनों में एक प्रकार के ही होते हैं और सदा युग्म (pair) में रहते हैं। कुछ दूसरे प्रकार के क्रोमोसोम भी पाए जाते हैं, जिन्हें लिंग निर्धारक (Sex determiner) कहा जाता है। अब तक जितने प्रकार के क्रोमोसोम पाए गए हैं, उन्हें एक्स (X), वाई (Y), डब्ल्यू (W), ज़ेड (Z) तथा ओ (O) की संज्ञा दी गई है। माना जाता है कि नर तथा मादा का निर्धारण इन्हीं लिंगनिर्धारक क्रोमोसोमों की सम तथा विषम संख्या द्वारा होता है, जैसे मनुष्यों में लिंग का निर्धारण इस प्रकार होता है :

21 अलिंग सूत्र + 1 एक्स + 1 वाई = पुरुष; तथा

21 अलिंग सूत्र + 2 एक्स = स्त्री।

क्रोमोसोमों की संख्या के अनुसार नर तथा मादा को विषमयुग्मकी (heterogamous) या समयुग्मकी (homogamous) कहा जाता है। किसी प्राणी में नर समयुग्मकी होती है, तो किसी में मादा। पक्षियों, तितलियों, मछलियों, जलस्थलचर (amphibians) आदि में मादा विषमयुग्मकी होती है। इन प्राणियों में लिंगनिर्धारक क्रोमोसोमों को ज़ेड (Z) तथा डब्ल्यू (W) नाम दिया जाता है, जबकि अन्य प्राणियों तथा वनस्पतियों में इन्हें एक्स (X) तथा वाई (Y) के नाम से संबोधित किया जाता है।

अनेक प्राणियों में एक्स तथा वाई ही नर या मादा लिंग का निर्धारण करते हैं। जब एक्स वाला शुक्राणु मादा के अंडे से संयुक्त होता है, तब युग्मनज को दो एक्स एक्स (XX) मिलते हैं और वह मादा बनता है। किंतु जब शुक्राणु का वाई मादा के अंडे के एक्स से संयुक्त होता है, तब युग्मनज को एक्स वाई, अर्थात् विषम संख्या प्राप्त होती है और वह नर होता है। मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों के नर तथा मादा के क्रोमोसोमों में जो विभेद पाया जाता है, वह अगले पृष्ठ की सारणी में दिखाया गया है।

वनस्पतियों में क्रोमोसोम

जिस प्रकार जंतुओं में क्रोमोसोमों का अध्ययन किया गया है, उसी प्रकार वनस्पतियों में भी उनका अध्ययन किया गया है। अधिकतर बीज वाले पौधे उभयलिंगाश्रयी (monoecious) होते हैं, अर्थात् उनमें नर तथा मादा लिंग एक साथ होते हैं। क्रोमोसोमों की गणना होने पर भी लिंग की चर्चा केवल नर-मादा-विश्लेषण के ही सन्दर्भ में की जाती है, क्योंकि लिंग और आनुवंशिकता की समस्या वनस्पति जगत में नहीं है। कुछ जाति में नर तथा मादा पौधे पृथक् होते हैं। ऐसे पौधों के भी एक्स (X) तथा वाई (Y) क्रोमोसोमों का पता चला है, जैसे इलोडिया कैनाडेंसिस (Elodea canadensis), मिलैंड्रियम एल्बम (Milandrium album) आदि। बीजवाला एक पौधा, फ्रेगैरिया इलैटिऑर (Fragaria elatior), चिड़ियों की भाँति क्रोमोसोम वाला (abraxas type) बतलाया जाता है। कुछ अन्य पौधों में नर विषमलिंगी (heterogametic) होते हुए भी दो वाई (Y) तथा एक एक्स (X) धारण करता है। ह्रास विभाजन (meiosis) के समय दोनों वाई (Y) तथा एक्स (X) पृथक् हो जाते हैं और दो वाई (Y) जनन कोशिका से मिलकर नर तथा एक एक्स (X) मादा भ्रूण के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इसी प्रकार लिंग का निर्धारण अन्य पौधों में भी होता है।

हार्मोन सिद्धांतसंपादित करें

प्राणियों के शरीर में कुछ ऐसी ग्रंथियाँ होती हैं जिन्हें वाहिनीहीन या अंत:स्रावी (Ductless, या Endocrine) कहा जाता है। कुछ विकसित विशेषकर कशेरुकी जंतुओं में इन ग्रंथियों के स्रावों का, जिन्हें हॉर्मोन कहते हैं, अध्ययन किया गया है। वनस्पतियों में भी हॉर्मोन होते हैं या नहीं, यह विवादग्रस्त विषय है। जंतुओं के शरीर में पाई जानेवाली ग्रंथियों के नाम हैं : पीयूष (Pituitary, या Hypophysio), पीनियल (Pineal), अवटुग्रंथि (Thyroid), पैराथाइरॉइड (Parathyroid), थाइमस (Thymus), पैक्रिअस या अग्न्याशय (Pancreas), वृक्क (Adrenal); जननग्रंथि (Gonads), नर में वृषण (Testis) तथा मादा में अंडाशय (Ovary)। इन ग्रंथियों से निकलने वाले हॉर्मोनों का अध्ययन विस्तार से किया गया है और यह पाया गया है कि नर प्राणी में पुरुषत्व (maleness) और मादा में स्त्रीत्व (femaleness) संबंधित गौण लैंगिक लक्षणों का अस्तित्व इन्हीं की क्रिया पर निर्भर करता है। जीन और क्रोमोसोम केवल यह निश्चित करते हैं कि युग्मनज नर होगा या मादा। वास्तविक पुरुषत्व और स्त्रीत्व का निर्धारण तथा उचित दिशा में उनका विकास वाहिनीहीन ग्रंथियों के स्रावों की सहायता से ही होता है। जैसे, कोई भ्रूण पुरुष के रूप में जन्म लेने वाला हो तो स्त्री हॉर्मोनों की सूई लगाकर अथवा उसे बधिया कर देने (castration) और उसके स्थान पर अंडाशय ग्रंथियों को आरोपित कर देने पर वह या तो पूर्णरूपेण स्त्री हो जाएगा, या उसमें स्त्रीत्व के लक्षण विकसित हा जाएँगे। ====

कुछ प्राणियों के नर तथा मादा क्रोमोसोमों की सारणी

नाम -- नर—मादा

कछुआ -- एक्स एक्स (XX) -- एक्स ओ (XO)

कबूतर—एक्स एक्स, या जेड जेड (XX या ZZ) -- एक्स ओ, या जेड डब्ल्यू (XO या ZW)

चमगादड़ -- एक्स ओ (XO) -- एक्स एक्स (XX)

चूहा -- एक्स वाई (XY) -- एक्स एक्स (XX)

चौपाए -- एक्स ओ (XO) -- एक्स एक्स (XX)

भेड़ -- एक्स वाई (XY) -- एक्स एक्स (XX)

चिंपैजी -- एक्स वाई (XY) -- एक्स एक्स (XX)

झींगुर, तेलचट्टा, टिड्डे -- एक्स ओ, या एक्स वाई (XO या XY) -- एक्स एक्स (XX)

सांड़ा -- एक्स एक्स (XX) -- एक्स ओ (XO)

मुर्गा-- एक्स एक्स, या जेड जेड (XX या ZZ) -- एक्स ओ या जेड डब्ल्यू (XO या ZW)

खरगोश -- एक्स वाई, या एक्स ओ (XY या XO) -- एक्स एक्स (XX)

कुत्ता -- एक्स वाई (XY) -- एक्स एक्स (XX)

भैंस -- एक्स वाई (XY) -- एक्स एक्स (XX)

घोड़ा -- एक्स वाई (XY) -- एक्स एक्स (XX)

बंदर—एक्स वाई (XY) -- एक्स एक्स (XX)

ड्रोसोफिला (a) -- एक्स वाई (XY) -- एक्स एक्स (XX)

लिंग निर्धारण का संतुलन सिद्धांतसंपादित करें

वनस्पतियों तथा जंतुओं का समुचित अध्ययन करने पर यह पाया गया है कि लिंग का निर्धारण नर और मादा प्रवृत्तियों का ही एकमात्र परिणाम नहीं होता। भ्रूण के विकास के साथ ही साथ नर और मादा निर्धारक तत्व भी समान रूप से ही विकसित होते हैं। कोई प्राणी नर या मादा केवल इसलिए नहीं हो जाता कि उसकी रचना विशेष संख्या वाले क्रोमोसोमों द्वारा हुई होती है, अपितु वह नर या मादा इसलिए भी हो जाता है कि उसने मादा या नर निर्धारक अन्य तत्वों को "दबा" (outweigh) दिया। सभी हॉर्मोनों का उत्पादन शरीर में होता रहता है, अत: जब स्त्रीत्व, या पुरुषत्व निर्धारक हॉर्मोन अधिक शक्तिशाली होंगे तब भ्रूण स्त्री, या पुरुष शरीर तथा प्रवृत्तियों की ओर अग्रसर होगा। हॉर्मोनों के संतुलन का ही यह परिणाम होता है कि प्राणी नर या मादा के रूप में जन्म लेता है। कर्ट स्टर्न (Curt Stern) ने यह दिखलाया है कि यदि किसी स्त्री में दो एक्स के स्थान पर तीन एक्स हों, तो उसमें अपेक्षाकृत अधिक स्त्रीत्व होगा। किंतु ऐसी स्त्री देर में ऋतुवती, अत्यधिक अल्पायु और सर्वथा वंध्या होगी। इसी प्रकार गोल्डश्मिट (Goldschmidt) ने लिमैट्रिया जैपोनिका नामक (Lymantria japonica) शलभ (moth) का अध्ययन कर यह बतलाया है कि जब बलवान नरों का निर्बल कीटों से संयुग्मन होता है तब 50% सामान्य नर और 50% अंतलिंगी मादा (intersexed femal) की उत्पत्ति होती है। किंतु जब अत्यधिक सशक्त नरों का निर्बल मादाओं से संयोग होता है तब 100% नर कीट उत्पन्न होते हैं। प्रो॰ एफ.ए.ई. क्रिउ (F.A.E. Crew) भी कहते हैं कि भ्रूण के लिंग का निर्धारण केवल क्रोमोसोमों से ही न होकर, उनमें पाए जानेवाले जीनों (genes) की तथा अलिंगसूत्रों (autosomes) में पाए जाने वाले जनकों की अंतक्रिया (interaction) से भी होता है, जैसे पक्षियों में मादा विषमलिंगी एक्स वाई (XY) तथा नर समलिंगी एक्स एक्स (XX) होते हैं। कीटों में लैंगिक विभाजन जनन ग्रंथियों पर निर्भर नहीं करता। उनके मुख्य जनकात्मक लक्षण इस प्रकार होते हैं : नर एक्स ओ (XO), या एक्स वाई (XY); मादा (XX) एक्स एक्स। फिंकलर (Finkler) ने सन् 1923 में कुछ नर कीटों के मस्तक काटकर मादाओं पर तथा मादाओं के मस्तक नरों पर लगा दिए। इन प्रयोगों में यह पाया गया कि कीटों ने अपने शरीर के अनुसार नहीं अपितु मस्तक के अनुसार काम किया, अर्थात् नर मस्तक वाली मादाओं ने नर की भाँति तथा मादा मस्तकवाले नरों ने मादा की भाँति लैंगिक लक्षण प्रकट किए।

लैंगिक द्विरूपता (Sexual Dimorphism)संपादित करें

'कॉमन फीजैन्ट' के नर एवं मादा

बहुत से जन्तुओं के नर और मादा के आकार एवं स्वरूप में स्पष्ट अन्तर होता है। इसे लैंगिक द्विरूपता कहते हैं।

यह बतलाया जा चुका है कि लैंगिक विकास के तृतीय चरण में नर मादा के भेद प्रकट होने लग गए थे। धीरे-धीरे अंडाशयतथा वृषणों का विकास हुआ और सहायक अंग भी क्रमश: विकसित होते गए। अनेक निम्न जीवों में, तथा वनस्पतियों में भी नर तथा मादा जननांग एक ही शरीर में पाए जाते हैं। ज्यों ज्यों उच्च वर्ग की ओर बढ़ा जाएगा तो यह मिलेगा कि लिंग स्पष्ट ही पृथक् हो गए हैं और नर तथा मादा शरीर की रचना भी पृथक् है।

लैंगिक द्विरूपता का परिचित उदाहरण बोनेलिया विरिडिस(Bonellia viridis) नामक एक समुद्री कृमि है। इसकी मादा हरे रंग की तथा आकृति में बेर जैसी होती है। समुद्र के तल में पत्थरों के नीचे या उनके छिद्रों में, यह कृमि निवास करता है। वहीं से अपनी द्विशाखित (bifurcated) शुंड (proboscis) को बाहर लहराते हुए यह जीव आहार ढूँढता रहता है। नर कृमि अत्यंत सूक्ष्म होता है और जननांगों के अतिरिक्त इसके अन्य सभी अंगों का ह्रास हो गया होता है। मादा के शरीर के भीतर नर कृमि परोपजीवी की भाँति रहता है। निषेचित अंडाशय विकसित होकर जल में स्वतंत्र रूप से तैरते हुए लार्वा की भाँति होते हैं। यदि कोई लार्वा समुद्रतल में बैठ जाता है, अथवा किसी मादा के शुंड में पहुँच नहीं पाता है, तो वह मादा के रूप में विकसित होने लगता है। किंतु यदि किसी प्रकार वह मादा के शुंड में आकर्शित होकर पहुँच जाता है, तो वह नर के रूप में विकसित होता है। मादा के शुंड में बंदी बौना नर, सरकते हुए उसे मुँह में तथा वहाँ से भी धीरे धीरे नीचे सरकते हुए मादा की जनन नलिका में पहुँचकर, डिंबाशयों को निषेचित करता है। निषेचित अंडाशय पुन: जल में त्याग दिए जाते हैं और स्वतंत्र रूप से लार्वा की भाँति तैरने लग जाते हैं।

इसी प्रकार सैकुलाइना (Sacculina) नामक एक परजीवी क्रस्टेशिया (crustacea) नर तथा मादा केकड़ों पर आश्रित रहता है। गियार्ड (1887 <Ç.) तथा स्मिथ (1906 ई.) ने लिखा है कि इस क्रस्टेशिया का शरीर केकड़े के उदर में पलता है और कुछ भाग शरीर भेदकर बाहर भी निकल आता है। जिस केकड़े के शरीर में यह घुसता है, उसके जननांगों को यह चूस डालता है। इसके कारण वह वंध्या हो जाता है। अधिकांश केकड़े मर जाते हैं, कुछ नर मादा गुणों से युक्त हो जाते हैं, अथवा मादा केकड़े अंतर्लिंगी बनकर वृषण तथा डिंबाशय दोनों उत्पन्न करने लग जाते हैं।

लिंग सहलग्न वंशागति (Sex-linked Inheritance)संपादित करें

लिंग सहलग्नता का अर्थ है, लैंगिक क्रोमोसोमों में पाए जानेवाले जीनों के अनुसार लिंगों में विभिन्नता। इन जीनों पर जो गुण या विशेषक (traits) निर्भर करते हैं, उन्हें लिंग सहलग्नता कहते हैं। इन गुणों या विशेषकों की पारेषण विधि को लिंग सहलग्न वंशागति कहते हैं, जैसे पुरुष में एक्स वाई (XY) तथा स्त्री में एक्स एक्स (XX) क्रोमोसोम होते हैं। कोई पुरुष यदि किसी आनुवंशिक दोष से दूषित है, तो केवल उसके पुत्र ही उस दोष को वंशगति में ग्रहण कर सकते हैं, पुत्रियाँ नहीं। सर्वप्रथम डॉंकास्टर (Doncaster) ने सन् 1908 में इस विषय पर प्रकाश डाला था। उन्होंने एक शलभ अब्रैक्सैस लैक्टिकलर (Abraxas lacticolor) की मादा का अब्रैक्सस ग्रॉस्सुलैरियाटा (Abraxas grossulariata) के नर से संयोग कराया। परिणामस्वरूप प्रथम पीढ़ी में सभी शलभ ग्रॉस्सुलैरियाटा वर्ग के कीट पाए गए। दूसरी पीढ़ी में ग्रॉस्सुलैरियाटा तथा लैक्टिकलर के अनुपात 3:1 थे, किंतु सभी लैक्टिकलर मादा निकले। इससे पता चला कि इस प्राणी में नर एक प्रकार के युग्मक (gametes) उत्पन्न करता है, किंतु मादा दो प्रकार के। अत: नर समयुग्मजी (homozygous) तथा मादा विषमयुग्मजी (Heterozygous) होती है। ब्रैवेल (Brambell) कहते हैं कि एक्स (X) क्रोमोसोम में कुछ अन्य प्रकार के आनुवंशिक कारक तथा जीन होते हैं। यदि यह सिद्धांत ठीक है, तो समयुग्मजी माता पिता के विशेषक (traits) उनके विषमयुग्मजी संतानों में चले जाएँगे। इस सिद्धांत को लिंग सहलग्नता (Sex linkage) कहा जाता है, जैसे फलमक्खी ड्रॉसोफिला (Drosophila) की मादा में दो एक्स (X) तथा नर में एक्स वाई (XY) क्रोमोसोम पाए जाते हैं। इसके एक्स (X) क्रोमोसोमों में लाल आँखों के जीन होंगे, या श्वेत आँखों के। लाल आँख वाले जीनों को प्रभावी (dominant) तथा श्वेत को अप्रभावी (recessive) कहते हैं। अत: जब श्वेत तथा लाल आँखों वाली मक्खियों का संयुग्मन होता है, तब लाल आँखों वाली संतान अधिक होती है। लिंग सहलग्नी रोगों में हीमोफिलिया (haemophilia) तथा रंगांधता (colour blindness) प्रमुख रोग माने जाते हैं।

अवियोजन (Non-disjunction)संपादित करें

शुक्राणु तथा डिंब संयुक्त होकर एक युग्मज (zygote) का निर्माण करते हैं। खंडी भवन (segmentation) की प्रक्रिया में एक ही निषेचित डिंब अनेक खंडों में तब तक विभाजित होता रहता है, जब तक वह पूर्ण भ्रूण नहीं बन जाता।

इस प्रक्रिया में शुक्राणु के क्रोमोसोम तथा डिंब के क्रोमोसोम एक साथ मिलकर विभाजित होते रहते हैं। उदाहरण के लिए, पुरुष के 23 तथा स्त्री के 23 क्रोमोसोम मिलकर 46 क्रोमोसोम हो जाते है। विभाजन के समय 23 क्रोमोसोम एक छोर (pole) की ओर तथा 23 दूसरी ओर चले जाते हैं। इन दोनों छोरों को पुत्रीकोशिका केंद्रक (Daughter cell nucleus) भी कहते हैं। विभाजन की इस सामान्य प्रक्रिया में अनेक प्रकार के दोष उत्पन्न हो सकते हैं जैसे एक केंद्र में 22 क्रोमोसोम चले जाएँ तथा दूसरे में 24, या कोई अन्य दुर्घटना घट जाए तो इसे अवियोजन कहा जाएगा। इस सिद्धांत के साथ ब्रिजेज़ (Bridges) का नाम लिया जाता है। इन्होंने सन् 1916 में कुछ उत्परिवर्ती (mutant) प्राणियों का अध्ययन किया था। इन्होंने पाया कि एक्स एक्स एक्स (XXX) तथा एक्स एक्स वाई (XXY) वाले दोनों प्राणी मादा थे, एक्सओ (XO) वाला प्राणी नर, किंतु संतानोत्पादन में अक्षम था और ओवाई (OY) वाला प्राणी बढ़ा ही नहीं। जिस प्राणी में एक एक्स (X) कम था, उसे प्राथमिक तथा जिसमें एक एक्स (X) अधिक था, उसे गौण अवियोजित कहा गया।

लैंगिक असामान्यताएँ (Sexual abnormalities)संपादित करें

अवियोजन की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप लैंगिक असामान्यताएँ हो जाती हैं। ये असामान्यताएँ मुख्यत: तीन प्रकार की होती हैं : (1) स्त्री पुरूष (2) उभयलिंगी तथा (3) मध्यलिंगी।

स्त्रीपुंरूषता (Gynandromorphism) - स्त्रीपुंरूषता के अंतर्गत ऐसे प्राणी आते हैं जिनमें नर तथा मादा दोनों की विशेषताएँ पाई जाती हैं, जैसे तितलियों, पक्षियों तथा कीट पतंगों में से कुछ तो आधे आधे स्त्री पुरुष होते हैं तथा कुछ में वे विशेषताएँ भिन्न भिन्न अनुपात में होती हैं। वैज्ञानिकों का विश्वास है कि स्त्रीपुरूष प्राणी का जीवन मादा के, जिसमें एक्स एक्स (XX) उपस्थित है, रूप में आरंभ होता है। जब कोशिका विभाजन प्रांरभ होता है। उस समय विभाजित कोशिका के एक भाग में क्रोमोसेम की संख्या में घटबढ़ हो जाती है। फलस्वरूप एक विभाजित कोशिका में केवल एक वाई (Y) ही आ पाता है। इस प्रकार के क्रोमोसोमों की असमान संख्या के कारण नर तथा मादा की आकृतियों में भिन्नता होती जाती है। ऐसे स्त्री-पुंरूष वाले प्राणियों की आंतरिक रचना के परीक्षणों से पता चलता है कि उनके शुक्राणु तथा डिंब जननांग भी उपस्थित रहते हैं। यह असामान्यता उन में अधिक मात्रा में पाई जाती है जिनमें हॉर्मोनो का प्रभाव अत्यल्प होता है, अथवा सर्वथा नहीं होता। यही कारण है कि कुछ पक्षियों को छोड़कर स्त्रीपुंरूपता अन्य विकसित तथा उच्च प्राणियों में नहीं पाई जाती।

उभयलिंगता (Hermaphroditism) - संसार के लगभग सभी जीव उभयलिंगी होते हैं। पुरुषत्व तथा स्त्रीत्व की दिशा में किसी प्राणी का विकास किस आधार पर होता है, इस संबंध में सभी वैज्ञानिक एक मत नहीं हैं। कोशिका विभाजन के समय क्रोमोसोमों की संख्या में क्यों अंतर आ जाता है, अथवा लिंगनिर्माण के समय वोल्फ़ी तथा म्यूलरी वाहिनियों (Wolffian and Mullerian ducts) में से एक का क्यों ह्रास हो जाता है, या पुरुषत्व अथवा स्त्रीत्व निर्धारक हार्मोन किसी नियम, या मात्रा से, क्यों और कैसे नि:स्रवित होते हैं? इन सब प्रश्नों का कोई संतोषजनक उत्तर अभी वैज्ञानिक नहीं दे पाए हैं। अत: हम यह मान लेंगे कि स्त्री या पुरुष होना निरे संयोग की बात है।

प्रत्येक प्राणी में यह क्षमता होती है कि वह नर, या मादा में विकसित हो जाए। उभयलिंगता इसका ज्वलंत उदाहरण है। उभयलिंगी कई प्रकार के होते हैं, जैसे (1) ऐसे प्राणी जो स्वनिषेचन (self-fertilization) करते हैं, जैसे हाइड्रा (hydra), फीताकृमि (tapeworm), चपटाकृमि (flatworm) आदि (इन जंतुओं में इनका अपना ही शुक्राणु अपने ही डिबों को निषेचित करता है), (2) दूसरे ऐसे प्राणी होते हैं जो निषेचन के लिए एक दूसरे पर निर्भर करते हैं; जैसे केंचुआ, जोंक आदि।

वनस्पतियों की भी अनेक जातियों में एक ही पौधे में कुछ फूल पौधे के किसी विशेष भाग में ही पाए जाते हैं। उच्च श्रेणी के अनेक पौधों में एक ही फूल में स्त्रीकेसर (pistils) तथा पुंकेसर (stamens) समीपस्थ होते हैं ताकि गर्भाधान में सरलता हो।

उभयलिंगियों में नर तथा मादा के अंत: और बाह्य लक्षण एकसाथ पाए जाते हैं। भेकों (toads) की मादाओं में शुक्र तथा नरों में डिंब ग्रंथियाँ प्राय: साथ साथ पाई जाती हैं। कछुओं में भी अंडवृषण (ovotestes) पाए गए हैं। कबूतरों में नर की शुक्र ग्रंथि डिंब तथा तारामीन की मादा के डिंबाशय में वृषण पाए गए हैं। केकड़ों में वृषण तथा डिंबाशय साथ साथ पाए गए हैं। इलास्मोब्रैक (Elasmobranch) मछलियों में निष्क्रिय वृषण और सक्रिय डिंबाशय साथ साथ पाए गए हैं। कुछ मछलियाँ ऐसी भी पाई गई जिनमें दो डिंबाशय तथा एक वृषण था।

मध्यलिंगता (Intersexuality) - यह वह स्थिति है जब कोई प्राणी किसी एक लिंग की ओर विकसित होते होते सहसा, किसी कारणवश, दूसरे लिंग को भी धारण कर ले। मनुष्यों में हिजड़ों (eunuchs) की यही अवस्था होती है। आनुवंशिकविज्ञान के अनुसार ऐसी अवस्था का कारण तीन कायिक, या दैहिक क्रोमसोम समूह के साथ दो एक्स (X) क्रोमोसोमों का होना है। (गोल्डश्मिट्)। इस अनुपात के कारण मक्खियों की बाहरी आकृति नर तथा मादा का मिश्रण होती है, यद्यपि जनन से उनके शरीर में नर तथा मादा ऊतक (tissues) नहीं पाए जाते। वे आकृति में या तो नर ही होंगी, या मादा ही। ऐसे प्राणी वंध्या होते हैं। ब्रैवेल ने बतलाया है कि अंतर्लिगी की जनन ग्रंथियाँ तो एक ही प्रकार की होती हैं, किंतु कुछ या सभी सहायक अंग तथा गौण लक्षण दूसरे लिंग का निर्णय मात्र कर देते हैं उनका वास्तविक विकास हार्मोनों के प्रभाव से ही होता है। सन् 1923 में क्रिउ ने कुछ घरेलू पशुओं (बकरे, सूअर, घोड़े, चौपाए, भेड़ तथा ऊँट) की जाँच की और पाया कि उनमें मिथ्या मध्यलिंगता (pseudo-intersexuality) थी, अर्थात् कुछ में तो नारी जननांग अत्यंत संकुचित थे, कुछ में सीधे और स्पष्ट, किंतु अनपेक्षित लंबे थे, तथा कुछ में स्पष्टत: नर के समान, किंतु अपूर्ण नलिकायुक्त थे। कुछ में वृषण तथा डिंब ग्रंथियाँ भी उपस्थित थीं। पुरुषों (मनुष्यों) में कुछ को मासिक धर्म होते तथा कुछ को दूध पिलाते हुए पाया गया है। जननांग में घाव, या शल्यक्रिया, या हार्मोन प्रयोग द्वारा माध्यलिंगता उत्पन्न हो सकती हैं।

लैंगिक परिवर्तन (Sexual Reversals)संपादित करें

अनेक प्राणियों में स्वत: लिंग परिवर्तन होता रहता है, उनका जीवनचक्र इस प्रकार होता है : नर (या मादा) र उभयलिंगी र मादा (या नर)। बोनेलिया, परजीवी केकड़ों, घोघों, मधुमक्खियों, तारामीनों तथा पक्षियों में लैगिक परिवर्तन प्राय: होते रहते हैं। प्राय: सभी वैज्ञानिकों ने मुर्गो में लैंगिक परिवर्तन का अध्ययन किया है और पाया है कि कोई मुर्गा आरंभ में मादा था और अंडे देता था, किंतु, डिंबाशय में रोग हो जाने के कारण अंडोत्पादन बंद हो गया। मुर्गी में धीरे धीरे मुर्गा के लक्षण प्रकट होने लगे और वह मुर्गियों में गर्भाधान करने लगी। क्रिउ का कहना है कि मादाओं में (चिड़ियों में) सामान्य डिंबाशय के साथ साथ एक छोटा, अल्पवर्धित वृषण भी होता है। डिंबाशय के निष्क्रिय होते ही वृषण सक्रिय हो जाता है। यही स्थिति उन मुर्गियों की हुई जिनकी डिंबग्रंथियाँ काटकर निकाल दी गई थीं।

चौपायों के जुड़वों (twins) में स्वतंत्र मार्टिन (Free Martin) नाम से एक असामान्य घटना का उल्लेख किया गया है। यह हॉर्मोन प्रभाव का उदाहरण है। जुड़वें तीन प्रकार के होते हैं : दोनों नर या दोनों मादा, या एक नर और एक मादा। अंतिम प्रकार में ऐसा होने की संभावना रहती है कि भ्रूणीय विकास में दोनों भ्रूणों में पारस्परिक रक्त का प्रवाह एक शरीर से दूसरे शरीर में होता रहे। ऐसी दशा में हॉर्मोनों का भी आदान प्रदान चल सकता है। नर हॉर्मोन पहले विकसित होता है और जुड़वों को नरत्व (maleness) की ओर ले चलता है। मादा हॉर्मोन देर में विकसित होता है और जुड़वों में से एक को मौलिक रूप से मादा बनाता है। फलस्वरूप जो मादा उत्पन्न होगी, उसमें नर के स्पष्ट लक्षण होंगे और वह वंध्या होगी। लिलि (Lillie) ने यह बतलाया है कि चौपायों के जुड़वों में सामान्य रक्तप्रवाह होता है और मादा को वास्तव में नर हॉर्मोनयुक्त रक्त प्राप्त होता है। अन्य पशुओं में जुड़वों में सामान्य रक्तप्रवाह की व्यवस्था नहीं होती, अत: उनमें स्वतंत्र मार्टिन नहीं होते।

लैंगिक परिवर्तन का प्रभाव मनुष्यों पर भी देखा जाता है। प्राय: समाचारपत्रों में पढ़ने को मिलता है कि अमुक का लिंग परिवर्तन हो गया। सन् 1935 तथा 36 के ओलिंपिक चैपियनों में दो स्त्रियाँ ऐसी पाई गई जो बाद में चलकर पुरुष हो गई। मनुष्यों में यौवनारंभ के पूर्व (Prepuberty) यदि स्त्री पुरुष की जननग्रंथियाँ काट दी जाएँ, तो उनका लिंग परिवर्तन तो हो जाएगा, किंतु वे पूर्णतया स्त्री, या पुरुष नहीं हो सकेंगे और न तो संतोनोत्पादन ही कर सकेंगे। उनके हाव-भाव अवश्य स्त्रियोचित, या पुरुषोचित हो जाएँगे। पक्षियों में लिंगपरिवर्तन स्त्रीत्व से पुरुषत्व की ओर ही होता है।

लिंग अनुपातसंपादित करें

इस का अर्थ है किसी प्राणी वर्ग में नर तथा मादा की उत्पत्ति, स्थिति तथा मृत्यु की दर। यह अनुमान किया जाता है कि कम से कम मनुष्यों में प्रथम संतान नर ही होती है। युद्ध के दिनों में भी अधिकांश संतानें नर होती हैं, क्योंकि प्रकृति स्वयं पुरुषों की कमी को पूरा करती है। प्राथमिक लिंग अनुपात की बात केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु पशु जगत् में भी लागू होती है। वहाँ भी उन पशुओं में जो हरम बनाकर रहते हैं, नर अधिक होते हैं, जैसे बंदरों की कुछ जातियाँ, शहद की मक्खी, चींटी, दीमक आदि। एक घोड़ा अनेक घोड़ियों को गर्भित करता है। यदि वह अधिकाधिक बार मैथुन करे तो लिंगानुपात में अद्भूतपूर्व परिवर्तन हो सकता है। मुर्गी से बलपूर्वक बच्चे पैदा कराए जाएँ, तो मादा बच्चे अधिक पैदा होंगे। गौण लिंगानुपात के संबंध में क्रिउ (Crew) ने कुछ नियम बतलाए हैं :

(1) प्राणियों की जातियों (species) के साथ अनुपात घटता बढ़ता रहता है, जैसे 100 मादाओं के अनुपात में मनुष्य नर 103-107, घोड़ा 98.6, कुत्ता 118.5, चौपाए 107.3, भेड 97.7, सूअर 111.8, खरगोश, 104.6, मुर्गा 93.4-94.7, कबूतर 115, मछली, कोटस (Cottus) 188 तथा लोफियस (Lophius) 385 होते हैं।

(2) प्रजाति (race), नस्ल (breed) तथा गोत्र (strain) के अनुसार अनुपात में अंतर होता है, जैसे : अमरीका में 106, ग्रेट ब्रिटेन, में 93.5, स्पेन में 95.3, जर्मनी, में 96.9, फ्रांस में 97.9, बेल्जियम में 98.4, इटली में 99, पोलैंड में 100, जापान में 102, भारत में 104 तथा चीन में 125 और यहूदियों में 104-105 पुरुष प्रति 100 स्त्रियों पर पाए जाते हैं।

(3) लैगिक अनुपात में प्रति वर्ष अंतर होता रहता है।

(4) वर्ष की विशेष मैथुन ऋतु (breeding season) का भी प्रभाव पशुओं पर पड़ता है।

(5) माता पिता की आयु और शारीरिक अवस्था का प्रभाव संतानों के अनुपात पर पड़ता है।

(6) गर्भ की कालानुक्रम संख्या (chronological number) का प्रभाव लैंगिक अनुपात पर पड़ता है।

(7) दो गर्भों के बीच का क्रम भी प्रभावशाली होता है। कर्ट स्टर्न (Curt Stern) के अनुसार अवैध (illegitimate) संतानों में नर की संख्या मादाओं से कम होती है। दूसरों के अनुसार नागरीकरण (urbanization), संकरण (cross breeding), सामाजिक आर्थिक अवस्था (socio economic status), भौगोलिक वातावरण आदि का भी प्रभाव लिंगानुपात पर पड़ता है।

अन्य प्राणियों में लिंगपरिवर्तन द्वारा लिंगानुपात निर्धारित होता है, जैसे जिफोफोरस हिलेरी (Xiphophorus hilleri) के अपरिपक्व प्राणियों में नर तथा मादा का अनुपात 0.5 : 1 का होता है, किंतु परिपक्व (mature) प्राणियों में यह अनुपात विपरीत (1 : 0.5) होता है।


विकिपीडिया
गुस्टाव क्लिम्ट की चित्रकारी जिसमें एक महिला अपनी जांघों को दूर किये बैठी है (1916)

हस्तमैथुन (अंग्रेजी: Masturbation) शारीरिक मनोविज्ञान से सम्बन्धित एक सामान्य प्रक्रिया का नाम है जिसे यौन सन्तुष्टि हेतु पुरुष हो या स्त्री, कभी न कभी सभी करते है।[1] इसे केवल युवा ही नहीं बल्कि बुड्ढे-बुड्ढे लोग भी लिंगोत्थान हेतु करते हैं इससे उन्हें यह अहसास होता है कि वे अभी भी यौन-क्रिया करने में सक्षम हैं।

अपने यौनांगों को स्वयं उत्तेजित करना युवा लड़कों तथा लड़कियों के लिये उस समय आवश्यक हो जाता है जब उनकी किसी कारण वश शादी नहीं हो पाती या वे असामान्य रूप से सेक्सुअली स्ट्रांग होते हैं। अब तो विज्ञान द्वारा भी यह सिद्ध किया जा चुका है कि इससे कोई हानि नहीं होती। पुरुषों की तरह महिलाएँ भी अपने यौनांगों को स्वयं उत्तेजित करने के तरीके खोज लेती हैं जो उन्हें बेहद संवेदनशील अनुभव और प्रबल उत्तेजना प्रदान करते हैं। फिर चाहें वे अकेली हों या अपनी महिला पार्टनर के साथ। महिलाएँ यदि अपने यौनांगों को स्वयं उत्तेजित न करें तो इस बात की भी सम्भावना बनी रहती है कि विवाह के बाद सेक्स क्रिया के दौरान उन्हें पर्याप्त उत्तेजना से वंचित रहना पड़े। औसत तौर पर पुरुष 12-13 वर्ष की उम्र में ही हस्तमैथुन शुरू कर देते हैं जबकि महिलाएँ तरुणाई (13 से 19 वर्ष) के अन्तिम दौर में हस्तमैथुन का आनन्द लेना शुरू करती हैं, लेकिन उनमें यह मामला इतना ढँका और छिपा हुआ रहता है कि कभी किसी चर्चा में भी सामने नहीं आ पाता। पूर्ण तरुण होने पर हस्तमैथुन का मामला खुले रहस्य की ओर झुकाव तो लेने लगता है पर ज्यादातर लोग इस मामले पर पर्दा ही पड़े रहना देना बेहतर समझते हैं। लेकिन अब जमाना बिल्कुल बदल गया है। अब कुछ ऐसे युवा तैयार हो रहे हैं जो इन वर्जनाओं को तोड़ कर हस्तमैथुन के तरीकों पर चर्चा में खुलकर हिस्सा ले रहे हैं।

पुरुष कैसे करते हैं

अपने आप हस्तमैथुन करता एक युवा पुरुष

पुरुष अपने शिश्न या लिंग को अपनी मुट्ठी में दबाकर या अपनी अँगुलियाँ से पकड़ कर इसे तेजी से रगड़ना या शिश्न के ऊपर की त्वचा को आगे-पीछे हिलाना शुरु करते हैं। यह प्रक्रिया कभी-कभी वे लिंगमुण्ड पर चिकनाई लगाकर भी करते हैं। इस कार्य में उन्हें अपार आनन्द की अनुभूति होती हैं। ये कार्य वे तब तक जारी रखते हैं जब तक उनका वीर्यपात या वीर्य स्खलन नहीं हो जाता।

इसके अतिरिक्त कभी कभार पुरुष तकिये के बीच में अपना लिंग दबा कर धीरे-धीरे आगे पीछे धक्का देते हुए इस तरह हिलाते हैं मानो वे किसी स्त्री की योनि में अपना पुरुषांग प्रविष्ठ कर रहे हों। अब तो कई प्रकार के नकली महिला जननांग भी बाजार में उपलब्ध हैं जो सॉफ्ट फाइवर के बने होते हैं और महिला जननांग जैसा ही अनुभव देते हैं। कुछ पुरुषों द्वारा इस प्रकार के उपाय भी स्वयं की यौन-सन्तुष्टि हेतु किये जाते हैं।

स्त्रियाँ कैसे करती हैं

स्त्रियाँ अपनी योनि को हिलाना या रगड़ना शुरू करती हैं। खासतौर पर वे अपने भगोष्ट को अपनी तर्जनी या मध्यमा अँगुली से हिलाती हैं। कभी-कभी योनि के अन्दर एक या दो से ज्यादा अँगुलियाँ डालकर उस हिस्से को हिलाना शुरू करती हैं जिस स्थान पर जी स्पाट होता है इसके लिए वे वाइब्रेटर अथवा डिल्डो का सहारा भी लेती हैं। बहुत सी महिलाएँ इसके साथ साथ अपने वक्षों को भी रगड़ती हैं। कुछ महिलाएँ उँगली डालकर गुदा को भी उत्तेजित करती हैं। कुछ इसके लिये कृत्रिम चिकनाई का प्रयोग भी करती है लेकिन बहुत सी महिलाएँ प्राकृतिक चिकनाई को ही काफी समझती हैं। कुछ स्त्रियाँ 2-3 मिनट में संतुष्‍ट हो जाती हैं और कुछ स्त्रियाँ संतुष्‍ट होने के लिए इसके लिए 15-20 मिनट का समय लेती हैं।

कुछ महिलाएँ केवल विचार और सोच मात्र से ही मदनोत्कर्ष (स्वत:स्खलन सीमा) तक पहुँच जाती हैं। कुछ महिलाएँ अपनी टाँगें कसकर बन्द कर लेती हैं और इतना दबाव डालती हैं जिससे उन्हें स्वत: यौन-सुख अनुभव हो जाता है। ये काम वे सार्वजनिक स्थानों पर भी बिना किसी की नजर में आये कर लेती हैं। इस क्रिया को महिलाएँ बिस्तर पर सीधी या उल्टी लेटकर, कुर्सी पर बैठकर या उकडूँ बैठकर भी करती हैं। लेकिन ऐसी कोई भी क्रिया जिसे बिना शारीरिक सम्पर्क के पूरा किया जाता है इस श्रेणी में नहीं आती।

भारतवर्ष में महिलाओं द्वारा हस्‍तमैथुन के लिये सब्जियाँ यथा लम्बे वाले बैंगन, खीरा, गाजर, मूली, ककडी आदि अपने जननांग में प्रविष्‍ठ कराकर भी सन्तुष्टि प्राप्‍त की जाती है। कुछ स्कूल में पढने वाली किशोर बालिकायें अपनी योनि में मोटा वाला कलम (पेन), मोमबत्ती या मोटी पेन्सिल डालकर हिलाती हैं। इस क्रिया से भी उन्हें चरमोत्कर्ष की प्राप्ति हो जाती है। यह भी देखा गया है कि कुछ महिलायें पलंग के किनारे अथवा किसी मेज के किनारे से अपने यौनांग रगड़ कर ही यौन-सुख प्राप्‍त कर लेती हैं।

परस्पर हस्तमैथुन

एक स्त्री व एक पुरुष परस्पर हस्तमैथुन करते हुए

जब स्त्री-पुरुष दोनों एक दूसरे को यौन सुख देने के लिये एक दूसरे का हस्तमैथुन करते है तो उसे अंग्रेजी में नाम दिया गया है-"ओननिज़्म"।

हस्तमैथुन एक व्यक्ति के जननांगों की यौन उत्तेजना को भी प्रभावित करता है। आमतौर पर संभोग से पूर्व स्त्री-पुरुषों में यह उत्तेजना मैन्युअली प्राप्त की जाती है। शारीरिक सम्पर्क (संभोग से कम) किये बिना अन्य प्रकार की वस्तुओं या उपकरणों के उपयोग द्वारा भी परस्पर हस्तमैथुन एक आम बात है जो एक पुरुष साथी अपनी दूसरी महिला साथी को अधिक समय तक यौन सन्तुष्टि प्राप्त करने के लिये करते हैं। अंग्रेजी में इसे "फोरप्ले" कहा जाता है।

पुरुषों और महिलाओं में और भी तकनीकों से हस्तमैथुन के लक्षण पाये जाते हैं, लेकिन इन तरीकों से हस्तमैथुन के अध्ययन में यह पाया गया है कि हस्तमैथुन स्त्री या पुरुष दोनों ही लिंगों और सभी उम्र के इंसानों में अक्सर होता है। यद्यपि वहाँ भिन्नता हो सकती है पर अपवाद नहीं। विभिन्न चिकित्सा पद्धति से मनोवैज्ञानिक लाभ पहुँचा कर यौन क्रिया को सामान्य करने के लिये भी हस्तमैथुन को स्वस्थ प्रक्रिया ठहराया गया है।

सदियों से चली आयी यह धारणा आज गलत सिद्ध हो चुकी है कि हस्तमैथुन से शारीरिक अक्षमता आती है बल्कि आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में "प्रतिदिन एक ओगाज़्म (यौनतुष्टि) हमेशा-हमेशा के लिये डॉक्टर को दूर रखता है।" जैसा क्रान्तिकारी नारा भी मैराथन (लम्बे) स्वास्थ्य के लिये दे दिया गया है।

प्रोस्टेट ग्रंथि एक अंग है जो वीर्य के लिये तरल पदार्थ का योगदान करता है, जैसा कि प्रोस्टेट को गुदा के अन्दर उँगली डालकर महसूस किया जा सकता है। ऐसा करने से भी कभी-कभी आनन्द मिलता है; अत: यह भी हस्तमैथुन का एक तरीका है।

म्युचुअल हस्तमैथुन सभी यौन झुकाव के लोगों द्वारा किया जाने वाला एक अभ्यास है जो पुरुष-लिंग को स्त्री-योनि में प्रवेश किये बिना एक विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। किशोरियों में उनके कौमार्य को संरक्षित करने के लिये या गर्भावस्था को रोकने के लिये भी यह सहायक हो सकता है। कुछ लोग इसे आकस्मिक सेक्स करने के लिये भी एक विकल्प के रूप में चुनते हैं, क्योंकि यह वास्तविक सेक्स के बिना ही यौन-सन्तुष्टि देता है। कुछ युवा लोगों के लिये, अपने दोस्तों के साथ परस्पर एक दूसरे का लिंग आपस में रगडकर यौन सन्तुष्टि में मदद करता है। कुछ लोगों को यह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया उनके अपने ओगाज़्म को विकसित करने अथवा अपने सुख में वृद्धि करने के लिये अधिक समय तक हस्तमैथुन करने के लिये प्रेरित भी करती है।

परस्पर हस्तमैथुन जोड़े या समूहों में पुरुषों या महिलाओं द्वारा किया जा सकता है या फिर किसी अन्य व्यक्ति को छूकर या बिना सम्पर्क द्वारा भी सम्पन्न हो सकता है।

हस्तमैथुन पर शोध

मध्यप्रदेश में खजुराहो में एक मंदिर राहत, भारत में एक जोड़े और एक औरत के साथ हस्तमैथुन करने वाली महिला के साथ यौन संबंध में एक जोड़ा है

हस्तमैथुन की आवृत्ति कई कारकों, जैसे यौन तनाव, हार्मोनल यौन आदतों, सहकर्मी को प्रभावित करने की मनोवृत्ति, उत्तम स्वास्थ्य और पारस्परिक यौन-क्रिया संस्कृति के अनुसार कम या ज्यादा हो सकती है। मसलन कोई एक दिन में एक बार, कोई दो बार करता है। यह ठीक उसी तरह जैसे कि भोजन कोई एक बार करता है तो कोई दो बार। इसका सम्बन्ध व्यक्ति की शारीरिक व मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। विभिन्न अध्ययनों में यह निष्कर्ष पाया गया है कि हस्तमैथुन मानवीय प्राणियों में अक्सर होता ही है। अमेरिका की आबादी पर अल्फ्रेड किन्से द्वारा 1950 अध्ययनों से पता चला है कि पुरुषों की 92% और महिलाओं की 62% संख्या में उनके जीवन काल के दौरान हस्तमैथुन की घटनाएँ पायी गयीं। इसी तरह के परिणाम 2007 में किये गये ब्रिटिश राष्ट्रीय सम्भाव्यता सर्वेक्षण में भी पाये गये। उसके अनुसार 16 से 44 वर्ष की आयु वर्ग के व्यक्तियों में पुरुषों की संख्या में 95% और महिलाओं की संख्या में 71% के बीच हुए सर्वेक्षण में पुरुषों की 73% और महिलाओं की 37% संख्या ने अपने साक्षात्कार के दौरान पहले चार हफ्तों में एक बार हस्तमैथुन किये जाने की सूचना दी, जबकि एक अन्य सर्वेक्षण में पुरुषों की 53% और महिलाओं की 18% संख्या ने पिछले सात दिनों में एक बार हस्तमैथुन करने की सूचना दी।

2009 में, ब्रिटेन सरकार द्वारा किशोरावस्था में कम से कम दैनिक हस्तमैथुन करने के लिए प्रोत्साहित करने की रेस में नीदरलैंड और अन्य यूरोपीय देश भी शामिल हो गये। प्रतिदिन एक ओगाज़्म उनकी स्वास्थ्य निर्देश पुस्तिका में एक अधिकार के रूप में परिभाषित किया गया था। यह अन्य यूरोपीय संघ के सदस्य देशों से डाटा और अनुभव के जवाब में किया गया था। ऐसा करने से किशोरों में अवांछित गर्भावस्था को रोकने, यौन रोगों (एस०टी०डी०) को कम करने और स्वस्थ आदतों को बढ़ावा देने में सहायक बताया गया।

पुरुष से गुदा मैथुन करते हुए पुरुष का चित्र

Sadhana गुदा मैथुन एक प्रकार का मैथुन ही है। इस प्रकार के मैथुन में शिश्न, उँगली, डिल्डो या अन्य किसी वस्तु को योनि की बजाय गुदा में प्रविष्ट किया जाता है। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो गुदा में लिंग डालकर सम्भोग करने की प्रक्रिया को ही गुदा मैथुन कहते हैं।.[1]

गुदा मैथुन के विभिन्न प्रकार हैं मसलन गुदा का मौखिक उकसाव, उकसाव के लिए उँगलियों अथवा अन्य वस्तुओं का उपयोग। सर्वप्रथम तो गुदा शरीर का ही एक भाग है जो कसा हुआ होता है और स्त्री योनि की भाँति स्वत: चिकना नहीं हो सकता। इसलिए इस अंग में कुछ भी प्रवेश कराते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि इस अंग कि भीतरी दीवारों को कोई क्षति न पहुँचे क्योंकि गुदा का मुख्य कार्य मल त्याग करना है मैथुन करना या करवाना नहीं।[2]

इस प्रकार के मैथुन से पुरुषों को आनन्द प्रोस्टेट (पौरुष ग्रन्थि) के उकसाव से आता है जो गुदा के अत्यधिक निकट पाया जाता है। जबकि स्त्रियों को आनन्द इसलिये आता है क्योंकि गुदा पर बहुत सी तन्त्रिकाओं की समाप्ति होती है।[3]

भारतीय शास्त्रों में कामसूत्र के जनक वात्स्यायन ने इसे भी सम्भोग का एक प्रकार बताया है। गुदा मैथुन का महत्व भारतीय समाज में पाश्चात्य समाज के समान नहीं है। अतः भारतीय जोड़ा गुदा मैथुन से पूर्व इसके बारे में पूर्ण जानकारी तथा सही तरीके का अध्ययन करें। सबसे आवश्यक बात गुदा मैथुन करते समय अपने साथी को पूर्ण उत्तेजित कर लें , तथा चिकनाई का विशेष ध्यान रखें। गुदा मैथुन को दर्द रहित बनाकर ही इसका पूर्ण आनंद लिया जा सकता है।पर बीना ज्ञान के गुदा मैथुन खतरनाक हो सकता है गुदा मैथुन करते समय विभिन्न सावधानी वर्तनी चाहिये।जैसे कि गुदा साफ हो मल का त्याग कर लेना चाहिये महिला किसी गुदा के रोग से ग्रस्त ना हो।लेकिन भारतीय महिलाये गुदा मैथुन को कम राजी होती है।


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