प्राचीन काल में लोग शादी-ब्याह के मामलों में और ऊंच-नीच, जाति-पाति के संकीर्ण विचारों से बहुत परे थे। गंधर्व विवाह इसका ज्वलंत उदाहरण है। मनु के शब्दों में गंधर्व विवाह कन्या और वर के परस्पर प्रेम के फलस्वरूप होता है। वैवाहिक संस्कार संभोग के बाद पूरे किये जा सकते हैं। इस प्रकार के विवाह में पुरूष स्त्री दोनों अपनी इच्छा के अनुसार एक दूसरे को चुन लेते हैं और एक दूसरे को पति पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेते हैं। वात्सायन के कामसूत्र में गंधर्व विवाह को एक आदर्श विवाह माना गया है। इससे वर वधू में जातियों और उपजातियों का नहीं बल्कि गुण और स्वभावों का मेल बिठाया जाता था और उस समय ऐसे विवाह सामाजिक रूप से मान्य होते थे।
गंधर्व विवाह के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं - व्यास और पराशर मुनि की माताएं दूसरे वर्ण की थी। व्यास की मां केवट पुत्री थी और पराशर की मां श्वपच (चांडाल) के घर जन्मी थी। - द्रपुद, मात्स्य, यवक्रीत, आयु, दत्त, द्रोण, कक्षीवान, श्रृंगी महर्षि, कश्यप मुनि, ये सब नीच कहे जाने वाले कुलों में जन्मे थे। - वशिष्ठ ने अपने पौत्र का विवाह चित्रमुख वैश्य की कन्या से किया था।
- राजा नीप का विवाह शुक्राचार्य ब्राह्मण की कन्या से हुआ था। - भीष्म के पितामह शान्तनु ने धीवर (केवट) कन्या से शादी की थी। - मातंग ऋषि के पिता नाई कुल के और मां ब्राह्मण थी। - क्षत्रिय कन्या पद्मा ने पिप्लाद और लोपामुद्रा ने अगस्तय ऋषि से विवाह किया था।
- विश्वामित्र ने मेनका से संबंध स्थापित किया था। - प्रियव्रत की बेटी उर्जस्वती ने शुक्राचार्य से विवाह किया था। - शकुंतला दुष्यंत से ब्याही गई थी। - सूर्यवंशी कन्या रेणुका का विवाह यमदाग्नि ऋषि से हुआ था।
हिन्दू शास्त्रों में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जिनमें विवाह जातीय समानता के आधार पर नहीं बल्कि गुण, कर्म और स्वभाव के मेल के आधार पर किये जाते थे। यही कारण है कि उस समय समाज व्यवस्थित, संगठित और स्थापक था। -परशुराम संबल
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