कुछ विद्धानों का विश्वास है कि प्राचीन काल में भारत में तक्षक नाम की एक जाति ही निवास करती थी। नाग जाति के लोग अपने आपको तक्षक की संतान ही बतलाते हैं। प्राचीन काल में ये लोग सर्प का पूजन करते थे। कुछ पाश्चात्य विद्वानों का मत है कि प्राचीन काल में कुछ विशिष्ट अनार्यों को हिंदू लोग तक्षक या नाग कहा करते थे। और ये लोग संभवतः शक थे। तिब्बत, मंगोलिया और चीन के निवासी अबतक अपने आपको तक्षक या नाग के वंशधर बतलाते हैं। महाभारत के युद्ध के उपरान्त धीरे धीरे तक्षकों का अधिकार बढ़ने लगा और उत्तर-पश्चिम भारत में तक्षक लोगों का बहुत दिनों तक, यहाँ तक कि सिकन्दर के भारत आने के समय तक राज्य रहा। इनका जातीय चिह्न सर्प था। ऊपर परीक्षित और जनमेजय की जो कथा दी गई है, उसके संबंध में कुछ पाश्चात्य विद्वानों का गत है कि तक्षकों के साथ एक बार पांडवों का बड़ा भारी युद्ध हुआ था जिसमें तक्षकों की जीत हुई थी ओर राजा परीक्षित मारे गए थे, और अंत से जनमेजय ने फिर तक्षशिला में युद्ध करके तक्षकों का नाश किया था और यही घटना जनमेजय के सर्पयज्ञ के नाम से प्रसिद्ध हुई है।
गरुड पुराण के अनुसार
गरुड पुराण में महर्षि कश्यप और तक्षक नाग को लेकर एक सुन्दर उपाख्यान दिया गया है। ऋषि शाप से जब राजा परीक्षित को तक्षक नाग डसने जा रहा था, तब मार्ग में उसकी भेंट कश्यप ऋषि से हुई। तक्षक ने ब्राह्मण का वेश धरकर उनसे पूछा कि वे इस तरह उतावली में कहां जा रहे हैं? इस पर कश्यप ने कहा कि तक्षक नाग महाराज परीक्षित को डसने वाला है। मैं उनका विष प्रभाव दूर करके उन्हें पुन: जीवन दे दूंगा। यह सुनकर तक्षक ने अपना परिचय दिया और उनसे लौट जाने के लिए कहा। क्योंकि उसके विष-प्रभाव से आज तक कोई भी व्यक्ति जीवित नहीं बचा था। तब कश्यप ऋषि ने कहा कि वे अपनी मन्त्र शक्ति से राज परीक्षित का विष-प्रभाव दूर कर देंगे। इस पर तक्षक ने कहा कि यदि ऐसी बात है तो आप इस वृक्ष को फिर से हरा-भरा करके दिखाइए। मैं इसे डसकर अभी भस्म किए देता हूं। तक्षक ने वृक्ष को अपने विष प्रभाव से तत्काल भस्म कर दिया।
इस पर कश्यप ऋषि ने उस वृक्ष की भस्म एकत्र की और अपना मन्त्र फूंका। तभी तक्षक ने आश्चर्य से देखा कि उस भस्म में से कोंपल फूट आई और देखते ही देखते वह हरा-भरा वृक्ष हो गया। हैरान तक्षक ने ऋषि से पूछा कि वे राजा का भला करने किस कारण से जा रहे हैं? ऋषि ने उत्तर दिया कि उन्हें वहां से प्रचुर धन की प्राप्ति होगी। इस पर तक्षक ने उन्हें उनकी अपेक्षा से भी अधिक धन देकर वापस भेज दिया। इस पुराण में कहा गया है कि कश्यप ऋषि का यह प्रभाव 'गरुड़ पुराण' सुनने से ही पड़ा था।
1. शेषनाग : शेषनाग के बारे में कहा जाता है कि इन्हीं के फन पर धरती टिकी हुई है यह पाताल लोक में ही रहते है। चित्रों में अक्सर हिंदू देवता भगवान विष्णु को शेषनाग पर लेटे हुए चित्रित किया गया है। दरअसल, शेषनाग भगवान विष्णु के सेवक हैं। मान्यता है कि शेषनाग के हजार मस्तक हैं। इनका कही अंत नहीं है इसीलिए इन्हें 'अनंत' भी कहा गया है। शेष को ही अनंत कहा जाता है ये कश्यप ऋषि की पत्नीं कद्रू के बेटों में सबसे पराक्रमी और प्रथम नागराज थे। कश्मीर के अनंतनाग जिला इनका गढ़ था।
ऋषि कश्यप की पत्नीं कद्रू के हजारों पुत्रों में सबसे बड़े और सबसे पराक्रमी शेष नाग ही थे। उनकी सांसारिक विरक्त का कारण उनकी मां, भाई और उनकी सौतेली माना विनता और गरूढ़ थे जिनमें आपसी द्वेष था। उन्होंने अपनी छली छली मां और भाइयों का साथ छोड़कर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करने को ही श्रेष्ठ माना। ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया और उन्हें पाताल लोक का राजा बान दिया। इसके अलावा उन्होंने भगवान विष्णु का सेवक बनना ही अपना सबसे बड़ा पुण्य समझा। शेषनाग के पृथ्वी के नीचे जाते ही अर्थात जललोक में जाते ही उनके स्थान पर उनके छोटे भाई, वासुकि का राज्यतिलक कर दिया गया।
2. वासुकि : शेषनाग के भाई वासुकि को भगवान शिव के सेवक थे। नागों के दूसरे राजा वासुकि का इलाका कैलाश पर्वत के आसपास का क्षेत्र था। पुराणों अनुसार वासुकि नाग अत्यंत ही विशाल और लंबे शरीर वाले माने जाते हैं। समुद्र मंथन के दौरान देव और दानवों ने मंदराचल पर्वत को मथनी तथा वासुकी को ही नेती (रस्सी) बनाया था। त्रिपुरदाह के समय वह शिव के धनुष की डोर बने थे।
वासुकि को भविष्य ज्ञात था कि आने वाले समय में नागकुल का नाश किया जाएगा। ऐसे में उन्होंने नागवंश को बचाने के लिए उनकी बहन का विवाह जरत्कारू से कर दिया था क्योंकि वे जानते थे कि उनका पुत्र ही नागों के वंश को बचा सकता है। जरत्कारु के पुत्र आस्तीक ने जनमेजय के नागयज्ञ के समय सर्पों की रक्षा की थी।
3. तक्षक : आठ प्रमुख नागों में से एक कद्रू के पुत्र तक्षक भी पाताल में निवास करते हैं। पाश्चात्य इतिहासकारों के अनुसार तक्षक नाम की एक जाति थी जिसका जातीय चिन्ह सर्प था। उनका राजा परीक्षित के साथ भयंकर युद्ध हुआ था। जिसमें परीक्षित मारे गए थे। तब उनके पुत्र जनमेजय ने तक्षकों के साथ युद्ध कर उन्हें परास्त कर दिया था। हालांकि पुराणकारों ने नागों के इतिहास को मिथक बनाकर उन्हें नाग ही घोषित कर दिया।
तक्षक ने शमीक मुनि के शाप के आधार पर राजा परीक्षित को डंसा लिया था। उसके बाद राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने नाग जाति का नाश करने के लिए नाग यज्ञ करवाया था। वेबदुनिया के शोधानुसार तक्षक का राज तक्षशिला में था। समुद्र के भीतर तक्षक नाम का एक नाग पाया जाता है जिसकी लंबाई लगभग 22 फुट की होती है और वह इतनी तेज गति से चलता है कि उसे कैमरे में कैद कर पाना मुश्किल है। यह सबसे भयानक सर्प होता है।
4. कर्कोटक : कर्कोटक और ऐरावत नाग कुल का इलाका पंजाब की इरावती नदी के आसपास का माना जाता है। कर्कोटक शिव के एक गण और नागों के राजा थे। नारद के शाप से वे एक अग्नि में पड़े थे, लेकिन नल ने उन्हें बचाया और कर्कोटक ने नल को ही डस लिया, जिससे राजा नल का रंग काला पड़ गया। लेकिन यह भी एक शाप के चलते ही हुआ तब राजा नल को कर्कोटक वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए।
शिवजी की स्तुति के कारण कर्कोटक जनमेजय के नाग यज्ञ से बच निकले थे और उज्जैन में उन्होंने शिव की घोर तपस्या की थी। कर्कोटेश्वर का एक प्राचीन उपेक्षित मंदिर आज भी चौबीस खम्भा देवी के पास कोट मोहल्ले में है। हालांकि वर्तमान में कर्कोटेश्वर मंदिर माता हरसिद्धि के प्रांगण में है।
5. पद्म : पद्म नागों का गोमती नदी के पास के नेमिश नामक क्षेत्र पर शासन था। बाद में ये मणिपुर में बस गए थे। असम के नागावंशी इन्हीं के वंश से है।
दरअसल, जनमेजय के नाग यज्ञ से भयभीत होकर शेषनाग हिमालय पर, कम्बल नाग ब्रह्माजी के लोक में, शंखचूड़ मणिपुर राज्य में, कालिया नाग यमुना में, धृतराष्ट्र नाग प्रयाग में, एलापत्र ब्रह्मलोक में, कर्कोटक महाकाल वन और अन्य कुरुक्षेत्र में तप करने चले गए थे।
उपरोक्त के अलावा महापद्म, शंख, कुलिक, नल, कवर्धा, फणि-नाग, भोगिन, सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि या यशनंदि तनक, तुश्त, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अहि, मणिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना, गुलिका, सरकोटा इत्यादी नाम के नाग वंश मिलते हैं।
कुछ पुराणों अनुसार नागों के प्रमुख पांच कुल थे- अनंत, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक और पिंगला। कुछ पुराणों के अनुसार नागों के अष्टकुल क्रमश: इस प्रकार हैं:- वासुकी, तक्षक, कुलक, कर्कोटक, पद्म, शंख, चूड़, महापद्म और धनंजय।
अग्निपुराण में 80 प्रकार के नाग कुलों का वर्णन है, जिसमें वासुकी, तक्षक, पद्म, महापद्म प्रसिद्ध हैं। वेबदुनिया के शोधानुसार नागों का पृथक नागलोक पुराणों में बताया गया है। अनादिकाल से ही नागों का अस्तित्व देवी-देवताओं के साथ वर्णित है। जैन, बौद्ध देवताओं के सिर पर भी शेष छत्र होता है। असम, नागालैंड, मणिपुर, केरल और आंध्रप्रदेश में नागा जातियों का वर्चस्व रहा है।
राम जैन धर्म भगवान् दशरथ इक्ष्वाकु वंश के राजा थे जिन्होंने अयोध्या पर शासन किया था। उनके चार राजकुमार थे, राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। जनक ने विदेह पर शासन किया। उनकी बेटी सीता का विवाह राम से हुआ था। रावण द्वारा सीता का अपहरण किया गया था, जो उसे अपने राज्य लंका ले गया था। सीता की खोज के दौरान, राम और लक्ष्मण सुग्रीव और हनुमान से मिलते हैं। सुग्रीव, वानर कबीले के राजा को अपने भाई वली (जो बाद में जैन भिक्षु बन गए और मोक्ष प्राप्त किया) द्वारा किष्किन्धा के सिंहासन से हटा दिया गया। राम और लक्ष्मण ने सुग्रीव को उसका राज्य वापस दिलाने में मदद की। उन्होंने सुग्रीव की सेना के साथ लंका की ओर कूच किया। विभीषण, रावण के भाई ने उसे सीता को वापस करने के लिए मनाने की कोशिश की। हालांकि, रावण सहमत नहीं हुआ। विभीषण ने राम के साथ गठबंधन किया। राम और रावण की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ था। लक्ष्मण अंत में रावण को मारते हैं (रामायण से विचलित होकर जहां नायक राम रावण को मारता है) और विभीषण लंका का राजा बन जाता है। राम और लक्ष्मण अयोध्या लौट आते हैं...
आंध्र प्रदेशातील कश्यप पुतळा कश्यप हा वैदिक आणि हिंदू पौराणिक साहित्यात निर्देशिलेला एक सुविख्यात ऋषी होता. ब्रह्मदेवाच्या अष्टमानसपुत्रांपैकी एक असलेल्या मरीचि ऋषींचा तो पुत्र होता. ( ऋषी मरीचि हे सप्तर्षिपैकी एक ऋषी मानले जातात आणि ब्रम्हदेवाचे मानस पुत्र आहेत. ऋषी कश्यप यांचे वडील आहेत.) दक्ष प्रजापतीच्या तेरा कन्यांशी याचा विवाह झाला होता दक्ष प्रजापति क्यों नहीं चाहते थे कि सती का विवाह शिव से हो, पढ़िये 2 पौराणिक कथा अनिरुद्ध जोशी पुराणों के अनुसार दक्ष प्रजापति परमपिता ब्रह्मा के पुत्र थे, जो कश्मीर घाटी के हिमालय क्षेत्र में रहते थे। प्रजापति दक्ष की दो पत्नियां थीं- प्रसूति और वीरणी। प्रसूति से दक्ष की 24 कन्याएं थीं और वीरणी से 60 कन्याएं। इस तरह दक्ष की 84 पुत्रियां थीं। समस्त दैत्य, गंधर्व, अप्सराएं, पक्षी, पशु सब सृष्टि इन्हीं कन्याओं से उत्पन्न हुई। दक्ष की ये सभी कन्याएं, देवी, यक्षिणी, पिशाचिनी आदि कहलाईं। उक्त कन्याओं और इनकी पुत्रियों को ही किसी न किसी रूप में पूजा जाता है। सभी की अलग-अलग कहानियां हैं। पहली कथा दक्ष प्रजापति ने अपनी...
वैदिक काळापसून गुरुशिष्य परंपरेमध्ये चौदा विद्यांचे शिक्षण गुरुगृही मिळत असे. यात ४वेद, ६वेदांगे, पुराणे, धर्मशास्त्र, न्यायशास्त्र आणि मीमांसाशास्त्र यांचा समावेश होता. अङानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः। धर्मशास्त्रं पुराणानि विद्याश्चैताश्चतुर्दश ।। चार वेद - संपादन करा १.ऋग्वेद : ऋक् म्हणजे देवतांची स्तुती वाचक मन्त्र होय. काही ऋचांचे मिळून सूक्ते होतात. यात एकूण १०२८ सूक्ते आहेत. शाकल, बाष्कल, आश्वलायन, माण्डूकायन, शांखायन अशा ५ शाखा आहेत. २. यजुर्वेद : या वेदातील मन्त्रांना यजुस् म्हणतात. यजुर्मन्त्र यागानुक्रमानुसार एकत्र केलेले आहेत. यजुर्वेदाचे कृष्णयजुर्वेद व शुक्लयजुर्वेद हे दोन भेद आहेत. ३.सामवेद : सामवेदाद्वारे ऋचांचे छंदोबद्ध गायन केले जाते. जैमिनीय, कौथुम आणि राणायनीय या सामवेदाच्या शाखा आहेत. ४.अथर्ववेद : सर्वसामान्य मानवाच्या लौकीक स्थैर्यासाठी अथर्ववेदातील मन्त्रे आहेत. या वेदाच्या शौनक आणि पैप्पलाद ह्या दोन शाखा आहेत. ...
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